संपादकीय

अब जम्मू-कश्मीर की तकदीर और तस्वीर बदलेगी

– ललित गर्ग –
अपने अनूठे एवं विस्मयकारी फैसलों से सबको चैंकाने वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाने का फैसला लेकर एक बार फिर चैका दिया है। जिस साहस एवं दृढ़ता से उसने चुनाव जीतने के बाद 100 दिन के भीतर यह निर्णय लेने की बात कहीं, वैसा ही करके उसने जनता से किये वायदे को निभाया है। कश्मीर में पिछले कुछ दिनों से जारी हलचल से यह तो अन्दाज लगाया जा रहा था कि कुछ अद्भुत होने वाला है, लेकिन इतना बड़ा और ऐतिहासिक होने वाला है, इसका किसी को भान तक नहीं था। लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने एकसाथ चार प्रस्ताव लाकर सबको हैरान कर दिया। सभी राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थों एवं राजनीतिक भेदों से ऊपर उठकर इस पहल का स्वागत और समर्थन करना चाहिए। क्योंकि इससे श्रेष्ठ भारत – एक भारत का सपना साकार होगा।
कश्मीर के एक वर्ग में खुद को देश से अलग और विशिष्ट मानने की जो मानसिकता पनपी है उसकी एक बड़ी वजह यही अनुच्छेद 370 है। यह अलगाववाद को पोषित करने के साथ ही कश्मीर के विकास में बाधक भी था। कश्मीर संबंधी अनुच्छेद 35-ए भी निरा विभेदकारी एवं  विघटनकारी है। इन दोनों अनुच्छेदों पर कोई ठोस फैसला लिया जाना जरूरी था। ये दोनों अनुच्छेद कश्मीर को देश की मुख्यधारा से जोड़ने और साथ ही वहां समुचित विकास करने में बाधक बने रहें। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेता चाहे जितना शोर मचाएं, कश्मीरी जनता को यह पता होना चाहिए कि ये दोनों अनुच्छेद उनके लिए हितकारी साबित नहीं हुए हैं। यदि इन अनुच्छेदों से किसी का भला हुआ है तो चंद नेताओं का और यही कारण है कि वे इस ऐतिहासिक फैसले का विरोध कर रहे हैं।
अपने फैसलों से लगातार चैंकाती रही नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर आज के अपने फैसले से विपक्षी दलों समेत हर किसी को हैरान कर दिया। कश्मीर में जिस तरह की हलचल पिछले कुछ दिनों से जारी थी, उससे ये अंदाजा तो सबको जरूर था कि सरकार कुछ बड़ा करने वाली है, लेकिन कश्मीर पर एकसाथ चार बहुत बड़े फैसले करेगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था। खुद विपक्ष के नेता भी स्वीकार कर रहे हैं कि उन्होंने इस ‘चैके’ की उम्मीद तो कतई नहीं की थी। सरकार के फैसले से पहले माना जा रहा था कि शायद कश्मीर से आर्टिकल 35ए को हटाने का फैसला किया जा सकता है, लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कश्मीर पर एकसाथ चार बड़े फैसले लेकर सभी अनुमानों को ध्वस्त करते हुए ऐतिहासिक कदम से पूरे देश को अवगत करा दिया उनकी झोली में खुशियां भर दी। विभिन्न राजनीतिक दलों ने जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार प्रदान करने वाली संविधान की अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया। हालांकि, कांग्रेस और तमिलनाडु की एमडीएमके ने इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन आम जनता में इस ऐतिहासिक फैसले को लेकर खुशी का माहौल है। सरकार के साहसपूर्ण कदम से न केवल जम्मू-कश्मीर में अमन एवं शांति कायम होगी बल्कि विकास की नई दिशाएं उद्घाटित होगी। इससे भारत की एकता और अखण्डता को बल मिलेगा। इससे जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के विकास को बल मिलेगा। इस मामले में मोदी सरकार के इरादों को लेकर किसी को कोई संशय है। समझना तो यह कठिन है कि राज्य में सुरक्षा मोर्चे को मजबूत किए जाने से कश्मीरी नेता परेशान क्यों हैं?
आजादी के समय से कतिपय गलत राजनीतिक निर्णय से यह प्रान्त तनावग्रस्त, संकटग्रस्त रहा। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को खत्म करने की मांग लगातार उठती रही है। लेकिन प्रान्त के स्वार्थी राजनीति दलों ने इस मांग को लगातार नजरअंदाज किया। लेकिन अब इस फैसले से जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा नहीं होगा। पहले वहां सरकारी दफ्तरों में भारत के झंडे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का झंडा भी लगा रहता था। यानी एक राष्ट्र एक ध्वज तिरंगा ही रहेगा। आर्टिकल 370 के कारण देश की संसद को जम्मू-कश्मीर के लिए रक्षा, विदेश मामले और संचार के सिवा अन्य किसी विषय में कानून बनाने का अधिकार नहीं था। जम्मू-कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने की अनुमति दी गई थी। लेकिन अब यह सब बदल गया है। राज्यपाल का पद खत्म हो जाएगा। इसके साथ ही राज्य की पुलिस केंद्र के अधिकार क्षेत्र में रहेगी। राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती थी। इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं था। यानी, वहां राष्ट्रपति शासन नहीं, बल्कि राज्यपाल शासन लगता था। लेकिन चूंकि जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित राज्य होगा, तो अब यह स्थिति भी बदल गई है। जम्मू-कश्मीर में अब दोहरी नागरिकता नहीं होगी। आर्टिकल 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में वोट का अधिकार सिर्फ वहां के स्थायी नागरिकों को ही था। दूसरे राज्य के लोग यहां वोट नहीं दे सकते और न चुनाव में उम्मीदवार बन सकते थे। अब नरेंद्र मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत का कोई भी नागरिक वहां के वोटर और प्रत्याशी बन सकते हैं। जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश होगा। अभी तक जम्मू कश्मीर का हिस्सा रहे लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा। यहां जम्मू-कश्मीर की तरह विधानसभा नहीं होगी। इसका प्रशासन चंडीगढ़ की तरह चलाया जाएगा। अनुच्छेद 370 के हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष अधिकार पूरी तरह से खत्म हो जायेंगे। इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान पूरी तरह से लागू होगा। बता दें कि कश्मीर में 17 नवंबर 1956 को अपना संविधान लागू किया था। अब कश्मीर में आर्टिकल 356 का भी इस्तेमाल हो सकता है। यानी राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। 
जम्मू-कश्मीर में आरटीआई और सीएजी जैसे कानून भी यहां लागू होंगे। जम्मू-कश्मीर में देश का कोई भी नागरिक अब नौकरी पा सकता है। भारतीय संविधान की धारा 360 जिसके अंतर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह धारा 370 के कारण जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। जम्मू कश्मीर भी इसके दायरे में होगा। अब वहां की महिला किसी अस्थायी निवासी से शादी कर लेती है तो भी उनको संपत्ति का अधिकार मिलेगा। पहले अस्थायी निवासी से शादी करने पर महिलाओं को तो संपत्ति में अधिकार दिया जाता था लेकिन इस तरह महिलाओं के बच्चे संपत्ति के अधिकार से वंचित हो जाते थे। आर्टिकल 370 को खत्म करने के फैसले के बाद अब ये सारी पाबंदियां खत्म हो गई हैं। अब समय आ गया है कि कश्मीरी जनता की तकदीर और कश्मीर की तस्वीर बदल बदल जायेगी।
अनुच्छेद 370 एक विभीषिका थी, एक त्रासदी एवं विडम्बना थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्र के एक अभिन्न अंग कश्मीर का 2.5 हिस्सा जानबूझ कर पाकिस्तान की गोदी में डाल दिया और शेष कश्मीर में ऐसे-ऐसे दुष्कृत्य हुये कि वह कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग कहा जाता था, वह नरक में तब्दील हो गया। यह एक साजिश थी और साजिश के सूत्रधार थे शेख अब्दुल्ला। तब से अब तक वे और उनका परिवार ही कश्मीर को अपनी बपौती समझते आये। इन्हीं लोगों ने अपनी स्वार्थों के चलते इस स्वर्ग को नरक बना दिया। समूची घाटी को उतना विषाक्त पाकिस्तान ने नहीं किया जितना कि इन आंतरिक षड्यन्त्रकारियों ने दिया। कश्मीर के मामले में पूर्ववर्ती सरकारों की नीति यही रही है कि वहां इतने अधिक धन का प्रवाह होता रहे, इतने ज्यादा अधिकार दिये जाते रहें, इतना ज्यादा तुष्टीकरण किया जाता रहे कि कश्मीरी जनता भारत के प्रति नतमस्तक रहे। राष्ट्र के सामने सवाल यह है कि भारत ने कश्मीर को जो भी विशेष सुविधायें दीं, उसकी एवज में उसे क्या मिला? उसे मिला कालूचक और कासिम नगर जैसे नरसंहार, घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन, पाक प्रायोजित आतंकवाद और पुलवामा जैसे नरसंहार। आजादी के बाद में ही हमारे हजारों जवानों ने भारत मां के मुकुट की रक्षा के लिये अपनी शहादतें दीं। भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के साथ मिलकर सरकार बनाई तो महबूबा अपना खेल खेलती रहीं। पत्थरबाज अपनी जांबाजी दिखाते रहे और सरकार उन पर दरियादिली दिखाती रही। इन जटिल एवं जहरीले हालातों से मुक्ति के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने साहसिक निर्णय लिया है, उससे समूचा देश दीवावली मना रहा है। केवल खुशियां मनाने से काम नहीं चलेगा, अब समूचे राष्ट्र को कश्मीर को बचाने की संकलपबद्ध होना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जनभावनाओं को समझते हुए नया इतिहास तो रच दिया, इन दोनों का नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया है, लेकिन अब उसे जीवंतता प्रदान करना समूचे देश का दायित्व है।

कोरे आश्वासनों-घोषणाओं से देश नहीं बनता-

कोई भी लोकनायक यदि मूल्य स्थापित करता है, कोई पात्रता पैदा करता है, कोई सृजन करता है, तो वह देश का गौरव बढ़ाता है, इसके लिये वह गीतों मंे गाया जाता है, लेकिन कोई भी अपने राजनीतिक लाभ के लिये लोक-लुभावन आश्वासनों से देश की अनपढ़ एवं भौलीभाली जनता को ठगने या लुभाने का प्रयत्न करता है तो इससे लोकतंत्र खतरे में आ जाता हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने शासनकाल में गरीबों को लाभ पहुंचाने के लिये कई कारगर उपाय किये। उन्हीं उपायों एवं योजनाओं में एक प्रमुख योजना थी गरीब किसानों को छह हजार रुपये सालाना देने की योजना। अब राहुल गांधी ने वोट बैंक को प्रभावित करने के लिये घोषणा की है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो वह देश के सबसे गरीब पांच करोड़ परिवारों को 72,000 रुपये सालाना देगी। किस तरह राजनीति आर्थिक नियम-कानूनों एवं राष्ट्रीय हितों को ताक पर रखकर चलती है, इसका यह एक त्रासद उदाहरण है। देश केवल ”लुभावने आश्वासनों या घोषणाओं“ से ही नहीं बनेगा, उसके लिए चाहिए एक सादा, साफ, पारदर्शी, व्यावहारिक और सच्चा राष्ट्रीय चरित्र, जो जन-प्रतिनिधियों को सही प्रतिनिधि बना सके। तभी हम उस कहावत को बदल सकेंगे ”इन डेमोक्रेसी गुड पीपुल आर गवरनेड बाई बैड पीपुल“ कि लोकतंत्र में अच्छे आदमियों पर बुरे आदमी राज्य करते हैं।कांग्रेस जब मोदी पर हमला करती है, या उनकी योजनाओं को कमतर करने के लिये जिस तरह की योजनाएं लाती हैं तो ये भूल जाती है कि उसने अपने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष साठ साल के शासन में ये योजनाएं क्यों नहीं लागू की? गरीबों का, किसानों का, बेरोजगारों का इतना ख्याल अब ही क्यों आ रहा है? सचाई तो यही है कि कांग्रेस के शासनकाल में ही गरीब अधिक गरीब हुआ और अमीर अधिक अमीर हुआ। जबकि उसने मोटे-मोटे जुमले उछालने एवं जमीनी स्तर पर आम आदमी का जीवन स्तर सुधारने का कोई ठोस काम नहीं किया। विपक्षी दल एवं कांग्रेस मोदी सरकार को घेरने के लिये कुछ चुनिंदा विषयों जैसे गरीबी, किसानों की बदहाली, बेरोजगारी को बार-बार चुनावी मुद्दा बनाती हैं। जबकि सचाई यही है कि इन क्षेत्रों को बेहतर बनाने के लिये मोदी सरकार ने जितना काम किया है, उतना पिछले 70 साल में किसी सरकार ने नहीं किया है। यही कारण है कि राहुल गांधी गरीब किसानों को छह हजार रुपये सालाना देने की मोदी सरकार की योजना के जवाब में अपनी यह योजना लाए हैं। उन्होंने जिस तरह यह हिसाब दिया कि इससे करीब 25 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे उससे यही पता चलता है कि वह यह मान कर चल रहे हैैं कि गरीब परिवारों की औसतन सदस्य संख्या पांच है। भले ही कांग्रेस अध्यक्ष ने न्यूनतम आय योजना को दुनिया की ऐतिहासिक योजना करार दिया हो, लेकिन देश यह जानना चाहेगा कि आखिर वह इस आंकड़े तक कैसे पहुंचे कि देश में सबसे गरीब परिवारों की संख्या पांच करोड़ है? एक सवाल यह भी है कि यह कैसे जाना जाएगा कि किसी गरीब परिवार के मुखिया की मौजूदा मासिक आय कितनी है, क्योंकि राहुल गांधी के अनुसार, गरीब परिवार की आय 12 हजार रुपये महीने से जितनी कम होगी उतनी ही राशि उसे और दी जाएगी। समझना कठिन है कि कांग्रेस किस तरह एक ओर गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपये भी देना चाहती हैै और दूसरी ओर ऐसे परिवारों की हर महीने की आय 12 हजार रुपये भी सुनिश्चित करना चाहती है? वर्तमान चुनावी परिदृश्यों को देखते हुए कांग्रेस का केन्द्र में सरकार बनाना असंभव है, फिर कोई अजूबा हो जाये और कांग्रेस सरकार बना ले तो बड़ा प्रश्न है कि आखिर पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपये देने के लिए प्रति वर्ष तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपये की भारी भरकम धनराशि कहां से जुटेगी? जब तक यह स्पष्टता सामने नहीं आती तब तक कांग्रेस अध्यक्ष की नई-अनोखी तथाकथित घोषणा पर केवल परेशान ही हुआ जा सकता है। गरीबी हटाने का वादा करना अच्छी बात है, लेकिन उसके नाम पर किसी भी दल को देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने की आजादी कैसी दी जा सकती। देश को अंधेरे गर्त में धकेलने की इन कुचेष्टाओं को आम जनता को समझना होगा, यह ऐसा जहर है जो इस प्रकार राष्ट्रीय जीवन में गरीबी समाप्त नहीं करतीं पर गरीबों को ही समाप्त कर देती हैं।हमारे राष्ट्रीय चरित्र की भी यही त्रासद स्थिति है। वह कई प्रकार के जहरीले दबावों से प्रभावित है। अगर राष्ट्र निर्माण की कहीं कोई आवाज उठाता है तो लगता है यह कोई विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुसाया जा रहा है। जिस मर्यादा, सद्चरित्र, पारदर्शिता और सत्य आचरण पर हमारी संस्कृति जीती रही है, सामाजिक व्यवस्था बनी रही है, जीवन व्यवहार चलता रहा है वे लुप्त हो गये। उस वस्त्र को जो राष्ट्रीय जीवन को ढके हुए था, हमने उसको उतार कर खूंटी पर टांग दिया है। मानो वह हमारे पुरखों की चीज थी, जो अब काम की नहीं रही।राष्ट्रीय चरित्र न तो आयात होता है और न निर्यात और न ही इसकी परिभाषा किसी शास्त्र में लिखी हुई है। इसे देश, काल, स्थिति व राष्ट्रीय हित को देखकर बनाया जाता है, जिसमें हमारी संस्कृति एवं सभ्यता शुद्ध सांस ले सके। आवश्यकता है उन मूल्यों को वापस लौटा लाने की। आवश्यकता है मनुष्य को प्रामाणिक बनाने की। आवश्यकता है राजनीतिक मूल्यों की। आवश्यकता है राष्ट्रीय हित को सर्वाेपरि रखकर चलने की, तभी देश के चरित्र में नैतिकता आ सकेगी, तभी गरीबी दूर हो सकेगी।पिछले कई वर्षों से राजनैतिक एवं सामाजिक स्वार्थों ने हमारे इतिहास एवं संस्कृति को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया है और प्रबुद्ध वर्ग भी दिशाहीन मोड़ देख रहा है। अपनी मूल संस्कृति को रौंदकर किसी भी अपसंस्कृति को बड़ा नहीं किया जा सकता। जीवन को समाप्त करना हिंसा है, तो जीवन मूल्यों को समाप्त करना भी हिंसा है। महापुरुषों ने तो किसी के दिल को दुखाना भी हिंसा माना है। लेकिन राजनेता तो लोकतंत्र के महाकुंभ के प्रसंग को ही अपनी ठगी एवं स्वार्थों के चलते आम जनता के घावों को भरने की बजाय इन्हें हरा करने की ठान कर हिंसक बना दिया है। नोेट छापकर गरीबों को बांटने की कोई योजना सुनने में आकर्षक लग सकती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस तरह की लोक-लुभावन योजनाओं से गरीबी दूर होने के बजाय और बढ़ती ही है। इतना ही नहीं, ऐसी योजनाओं पर अमल करने वाले देश आर्थिक रूप से बर्बाद भी होते हैैं। कितना अच्छा होता इन चुनावों में राजनीतिक दल गरीबी दूर करने के लिये कोई ठोस एजेंडा प्रस्तुत करते, जैसे उन्हें काम देने, देश के निर्माण में उनकी शक्ति को नियोजित करने, नये उद्योग स्थापित करने, रोजगार बढ़ाने, किसानों को उन्नत खेती के उपकरण देने, बेरोजगार युवाओं के लिये कैरियर के उन्नत अवसरों को निर्मित करने की बात की जाती। आज करोड़ों के लिए रहने को घर नहीं, स्कूलों में जगह नहीं, अस्पतालों में दवा नहीं, थाने में सुनवाई नहीं, डिपो में गेहूं, चावल और चीनी नहीं, महिलाओं की अस्मिता सुरक्षित नहीं, तब भला राहुल गांधी जैसे राजनीति पहरुआ, जिनकी 2004 में घोषित 55 लाख की जमीन-जायदाद 2014 में नौ करोड़ की संपदा हो जाती है, भला इन तथाकथित राजकुमारों की फौज अपनी घोषणाओं से कौनसा ”वाद“ लाएगी? आज अशिक्षितों, बेरोजगारों और भूखों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जिनके हाथों में स्लेट और किताबें होनी चाहिएँ, वे बर्तन मल रहे हैं। नारी को नंगा किया जा रहा है। केवल गांवों मंे ही नहीं, शहरों में, विज्ञापनों में, टी.वी. में, गीतों में।जन प्रतिनिधि लोकतंत्र के पहरुआ होते हैं और पहरुआ को कैसा होना चाहिए, यह एक बच्चा भी जानता है कि ”अगर पहरुआ जागता है तो सब निश्चिंत होकर सो सकते हैं।“ इतना बड़ा राष्ट्र केवल कानून के सहारे नहीं चलता और तथाकथित आश्वासनों एवं घोषणाओं से भी नहीं। उसके पीछे चलाने वालों का चरित्र बल होना चाहिए। इन नये राजकुमारों की बढ़ती सुविधाओं एवं सम्पदा को गरीब राष्ट्र बर्दाश्त भी कर लेगा पर अपने होने का भान तो ये कराए। जो वायदे येे अपने मतदाताओं से करते हैं, जो शपथ उन्होंने भगवान या अपनी आत्मा की साक्षी से ली है, जो प्रतिबद्धता उनकी राष्ट्र के विधान के प्रति है, उसे तो पूरा करें। कोरे घोषणाओं एवं आश्वासनों से देश नहीं बनता।

विनाश से बचाने के लिये प्रकृति संरक्षण जरूरी

पिछले कुछ समय से दुनिया में पर्यावरण के विनाश एवं प्रकृति प्रदूषण को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी एवं प्रकृति के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं, उनसे राजनेता, वैज्ञानिक, धर्मगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता भी चिंतित हैं। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे।

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस प्रत्येक वर्ष 28 जुलाई को मनाया जाता है। वर्तमान परिपे्रक्ष्य में कई प्रजाति के जीव-जंतु, प्राकृतिक स्रोत एवं वनस्पति विलुप्त हो रहे हैं। विलुप्त होते जीव-जंतु और वनस्पति की रक्षा के लिये विश्व-समुदाय को जागरूक करने के लिये ही इस दिवस को मनाया जाता है। आज चिन्तन का विषय न तो युद्ध है और न मानव अधिकार, न कोई विश्व की राजनैतिक घटना और न ही किसी देश की रक्षा का मामला है। चिन्तन एवं चिन्ता का एक ही मामला है लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही गर्मी, सिकुड़ रहे जलस्रोत विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन- ये सब पृथ्वी एवं पृथ्वीवासियों के लिए सबसे बडे़ खतरे हैं और इन खतरों का अहसास करना ही विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस का ध्येय है। प्रतिवर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। हर चीज की उपलब्धता कम हो रही है। आक्सीजन की कमी हो रही है। साथ ही साथ हमारा सुविधावादी नजरिया एवं जीवनशैली पर्यावरण एवं प्रकृति के लिये एक गंभीर खतरा बन कर प्रस्तुत हो रहा हैं।
जल, जंगल और जमीन इन तीन तत्वों से प्रकृति का निर्माण होता है। यदि यह तत्व न हों तो प्रकृति इन तीन तत्वों के बिना अधूरी है। विश्व में ज्यादातर समृद्ध देश वही माने जाते हैं जहां इन तीनों तत्वों का बाहुल्य है। बात अगर इन मूलभूत तत्व या संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। आधुनिकीकरण के इस दौर में जब इन संसाधनों का अंधाधुन्ध दोहन हो रहा है तो ये तत्व भी खतरे में पड़ गए हैं। पिछले दिनों पहाड़ों के शहर शिमला में पानी की भयावह कमी आ गई थी। अनेक शहर पानी की कमी से परेशान हैं। ये सब आजकल साधारण सी बात है। आज हम हर दिन किसी-न-किसी शहर में पीने के पानी की कमी के बारे में सुन सकते हैं। इस तरह की प्रकृति एवं पर्यावरण से जुड़ी विकराल स्थितियों के प्रति सचेत एवं सावधान नहीं हुए तो भविष्य निश्चित ही खतरे में पड़ेगा। आज जरूरत हमारी पृथ्वी के पर्यावरण को स्वस्थ बनाये रखने की है, उसे संरक्षित करने की है। बहुत चिंता का विषय है कि खुद मनुष्य पृथ्वी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। कितनी विचित्र बात है कि एक आदमी ही ऐसा प्राणी है जिसने सब कुछ पाकर स्वयं को खो दिया है। आप ही बताइये कि कहां खो गया वह आदमी जो स्वयं को कटवाकर भी वृक्षों को कटने से रोकता था? गोचरभूमि का एक टुकड़ा भी किसी को हथियाने नहीं देता था। जिसके लिये जल की एक बूंद भी जीवन जितनी कीमती थी। कत्लखानों में कटती गायों की निरीह आहें जिसे बेचैन कर देती थी। जो वन्य पशु-पक्षियों को खदेड़कर अपनी बस्तियों बनाने का बौना स्वार्थ नहीं पालता था। अब वही मनुष्य अपने स्वार्थ एवं सुविधावाद के लिये सही तरीके से प्रकृति का संरक्षण न कर पा रहा है और उसके कारण बार-बार प्राकृतिक आपदाएं कहर बरपा रही है। रेगिस्तान में बाढ़ की बात अजीब है, लेकिन हम इनदिनों राजस्थान में अनेक शहरों में बाढ़ की विकराल स्थिति को देख रहे हैं। जब मनुष्य प्रकृति का संरक्षण नहीं कर पा रहा तो प्रकृति भी अपना गुस्सा कई प्राकृतिक आपदाओं के रूप में दिखा रही है। निःसंदेह प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आज हमारी मुख्य प्राथमिकता है।
यह देखा गया है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है। अगर प्रकृति के साथ इस प्रकार से खिलवाड़ होती रही तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब हमें शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा। आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर विशेष दिया जाए, जिसमें मुख्यतः धूप, खनिज, वनस्पति, हवा, पानी, वातावरण, भूमि तथा जानवर आदि शामिल हैं। इन संसाधनों का अंधाधुंध दुरुपयोग किया जा रहा है, जिसके कारण ये संसाधन धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर हैं।
प्रकृति के संरक्षण को सभी देशों की सरकारों एवं विभिन्न गैर-राजनैतिक संगठनों ने बड़ी गम्भीरता से लिया है और इस पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया है। ऐसे भी अनेक तरीके हैं जिनमें आम आदमी भी इनके संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है। हमें शुद्ध हवा के लिए पेड़ों की आवश्यकता होती है, इसलिये अधिक से अधिक पेड़ लगाने की तरफ ध्यान दिया जाना जरूरी है। पृथ्वी का जल स्तर बड़ी तेजी से नीचे होता जा रहा है। हमें पानी का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए और पानी की अधिक से अधिक बचत करनी चाहिए। हमें वर्षा के जल को पुनः उपयोग में लाने वाली प्रणाली को विकसित करना होगा। हमें बिजली की बर्बादी को भी रोकना होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं है जब हम अंधेरे में ही अपना जीवन-यापन करने को मजबूर हो जायेेंगे। हमें कागज के उपयोग को सीमित करना होगा, क्योंकि कागज पेड़ों की लकड़ी से बनता है जिसके लिए हमें बड़ी संख्या में पेड़ काटने पड़ते हैं। आजकल भूमि भी जहरीली होती जा रही है जिससे उसमें उगने वाली वनस्पतियों में विषाक्तता बढ़ती जा रही है। इसके लिए हमें गोबर की खाद का प्रयोग करना होगा, तभी हमारी भूमि बच सकती है। इसके लिए हमें गाय को बचाना होगा क्योंकि गाय से हमें अच्छा दूध, गोबर, गोमूत्र आदि प्राप्त होते हैं जो प्रकृति एवं मानव के लिए बहुत ही उपयोगी है। मनुष्य को अपनी जीविका चलाने के लिए सब्जियों, ईंधन, गैस, पानी, हवा एवं रोशनी की अत्यधिक आवश्यकता होती है। इसलिए हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाने चाहिए, ताकि वातावरण स्वच्छ एवं शुद्ध रहे और पेड़ों की कटाई की भरपाई आसानी से की जा सके।
गत दिनों लगभग पूरा देश प्रचंड गर्मी की चपेट में रहा। यह प्रचंड गमी पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है। गर्मी का अधिक अहसास होने का कारण हमारी सुविधावादी जीवनशैली है। यह गर्मी इसलिये भी बढ़ रही है कि हमने पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति घोर उपेक्षा बरती है। लगातार दी जा रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया है। इसी कारण देखने में आ रहा है कि मौसम की मार से निपटने में हम पहले के मुकाबले कहीं न कहीं कमजोर पड़ते जा रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली, खानपान, रहन-सहन के बदलते तौर तरीकों ने हमें मौसम की मार का सामना करने के मामले में कमजोर कर दिया है। एअर कंडीशनर का ही उदाहरण लें। यही एअर कंडीशनर अपनी गरम हवा से वातावरण को असंतुलित बनाता है। हमारी सुविधावादी जीवनशैली से निकलने वाली विषैली गैसों के एक ”अणु“ में ओजोन के लाख अणुओं को नष्ट करने की क्षमता है। इन खतरों से हम सब वाकिफ हैं, पूरे देशवासियों को इस बार गहरे रूप में झकझोरा है। प्रचंड गर्मी में जीवन होम करने एवं पृथ्वी को विनाश की सीमा तक जाने से पहले बहुत कुछ करना चाहते हैं। पर कैसे लौटा पाएंगे देश को 20-30 साल पहले की स्थिति मंे? कैसे रोकेंगे कार्बन डाईआक्साइड और मिथेन गैस के उत्र्सजन को। गरमी के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में जंगल धधक उठते हैं। उत्तराखंड के जंगल जलते रहे हैं। सवाल है कि जब ऐसी घटनाओं से हम हर साल दो-चार होते हैं तो भविष्य के लिए कोई सबक क्यों नहीं लेते। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र के विदर्भ और उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में पीने के पानी की समस्या बढ़ गई है। इन इलाकों के कई जलाशयों में पानी का स्तर क्षमता का 10 फीसदी ही रह गया है, जिससे कुछ फसलें संकटग्रस्त हो गई हैं। लेकिन केवल सरकारी प्रयत्नों से इस संकट से उपरत नहीं हुआ जा सकता। सरकारी प्रयत्नों से भी ज्यादा आवश्यक है-मानव स्वभाव का प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित हो। सहज रिश्ता कायम हो। जीवन शैली में बदलाव आये। हर क्षेत्र में संयम की सीमा बने। हर नागरिक जागरूक हो। हमारे दिमागों में भी जो स्वार्थ एवं सुविधावाद का शैतान बैठा हुआ है, उस पर अंकुश लगे। मनुष्य का आंतरिक रसायन भी बदले, तो बाहरी प्रदूषण में भी परिवर्तन आ सकता है, सुख एवं सुविधावाद के प्रदूषण के अणु कितने विनाशकारी होते हैं, सहज ही विनाश का रूप ले रही प्रकृति की विनाशलीला को देखकर कहा जा सकता है। प्रकृति संरक्षण का समस्त प्राणियों के जीवन तथा इस धरती के समस्त प्राकृतिक परिवेश से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रदूषण के कारण सारी पृथ्वी दूषित हो रही है और निकट भविष्य में मानव सभ्यता का अंत दिखाई दे रहा है। इस स्थिति को ध्यान में रखकर सन 1992 में ब्राजील में विश्व के 174 देशों का ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। इसके पश्चात् सन 2002 में जोहान्सबर्ग में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित कर विश्व के सभी देशों को पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देने के लिए अनेक उपाय सुझाए गये। वस्तुतः प्रकृति के संरक्षण से ही धरती पर जीवन का संरक्षण हो सकता है। 

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