जीवन के सही उद्देश्यों की तलाश करें

-ललित गर्ग-

जीवन का सार है प्रसन्नता और प्रगति। हममें से हर कोई प्रसन्न रहना एवं प्रगति करना चाहता है। हम जब आसपास देखते हैं तो अधिकांश व्यक्ति हमें इसी दौड़ में शामिल दिखाई देते हैं, लेकिन न वे खुश है और न अपनी प्रगति से संतुष्ट है। क्योंकि उनके जीवन के सही उद्देश्यों की तलाश कहीं पीछे छूट जाती है। अच्छा या बुरा, सब होता रहता है। मायने इसी बात के हैं कि आपके जेहन में क्या चल रहा है? आप क्या सोच रहे हैं? अपनी सोच के अलावा किसी और चीज पर हमारा काबू भी नहीं होता। हमारे ज्यादातर दुख हमारी अपनी उम्मीदों से पैदा होते हैं। जो हो रहा होता है, उसके लिए हमारे दिमाग में कोई और ही तस्वीर होती है। नतीजा ये कि ‘जो है’ से ज्यादा हम ‘जो होना चाहिए’ उसी पर सोचते रह जाते हैं।
वर्तमान में नकारात्मकता का प्रभाव अपने चरम पर है। इसका असर लोगों के व्यवहार में आए बदलाव और बदलते समाज के रूप में देखा जा सकता है। इससे बचने के लिए एक ही बात मूलमंत्र की तरह दोहराई जाती है वह है सकारात्मक सोच। पर मात्र पॉजिटिव सोच रखने से ही सब कुछ नहीं हो जाता। जरूरत इस बात की भी है कि विचारों को खराब होने से पहले ही उन्हें बदलकर इतना ऊपर उठा लेना कि कोई परेशानी फिर छू ही नहीं पाए। 
अपना जीवनस्तर ऊंचा करने के लिए इनसान किसी-न-किसी चीज के पीछे भाग रहा है। इस भागमभाग ने उसे भीतर से खाली कर दिया है। इसका साक्षात प्रमाण है दुनिया में बढ़ता तनाव एवं कुंठा। इन स्थितियों के बढ़ते प्रभाव का मतलब है इनसान का अपनी सोच व भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना। संतुलित सोच का मतलब है कि जैसे ही भीतर से बहुत परेशान करने वाली सोच की आहट हो तो फौरन इसे भांप कर अपनी सोच को परिष्कृत कर स्वयं को ऊपर उठा देना। समस्या को बड़ा बनने ना देना। कितनी ही बार हम ऐसी बातों पर चिंता कर रहे होते हैं, जिनकी वास्तव में जरूरत ही नहीं होती। हम जरूरत से ज्यादा तनाव लेते हैं और बेवजह सोचते रहते हैं। दिक्कत यह है कि हम एक साथ सब साध लेना चाहते हैं। जहां खुद को धीमा करने की जरूरत होती है, वहां हम तेज हो जाते हैं, बेचैन हो जाते हैं। लेखिका जे. के. रोलिंग कहती हैं, ‘कितनी ही बार प्रश्न जटिल होते हैं और उनके जवाब बेहद आसान।’ लेकिन हमारी नकारात्मकता इन आसान स्थितियों को भी जटिल बना देती है।
मान लीजिए कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की बात से, उसकी तरक्की से, उसके सुखों से इस कदर परेशान हो उठता है कि वह उक्त इनसान से बदला लेने की सोचता रहता है या फिर खुद की सलामती के लिए दूसरे के बदल जाने या उसके समाप्त होने की इच्छा रखने लगता है। इसी सोच में वह अपने जीवन का कीमती समय व्यर्थ गंवा देता है, इसी ईष्र्या एवं जलन के साथ वह इतना समय निकाल देता है कि उसकी खुद की मनःस्थिति उसके नियंत्रण में नहीं रह पाती। उसके रहे-सहे अच्छे विचार भी नकारात्मक रूप में बदल जाते हैं। जबकि यहां संतुलित सोच सिखाती है बदला लेने की सोचने की बजाय स्वयं को बदल के देखो। कुछ आदतें ऐसी होती हैं, जो एक सीमा के बाद हमारे काम में अड़चन डालने लगती हैं। इच्छा के बावजूद हम वह हासिल नहीं कर पाते, जो करना चाहते हैं। आदतें भले ही आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं, पर ऐसा भी नहीं है कि उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। बशर्ते आप कुछ नई आदतों के लिए तैयार रहें। विचारक इरेसमस कहते हैं, ‘कांटा कांटे से ही बाहर निकलता है। आदत भी आदत से ही छूटती है।’
दरअसल, जब आप किसी बुरी बात की आशंका में खुद को घेरना शुरू कर देते हैं तो लगता है कि जो कुछ सोच रहे हैं, वह बस होने ही वाला है। कई बार यह डर इतना हावी हो जाता है कि हम छोटी-छोटी खुशियों का भी आनंद नहीं ले पाते। नाहक ही उस स्थिति से लड़ने या भाग खड़े होने की स्थिति में आ जाते हैं। यह नकारात्मकता तन व मन दोनों को दुर्बल कर देती है। धीरे-धीरे आप लक्ष्य को भूल कर अनिष्ट की चिंता में घुलने लगते हैं। सुरक्षित खेल की तरफ बढ़ने लगते हैं। आपकी रोजमर्रा की खुशी, उत्पादकता, उपलब्धियां घटने लगती हैं। मन अशांत रहता है। जब तक बुरा सोचना बंद नहीं करते, तब तक बेचैन बने रहते हैं और आपके भीतर का आलोचक मन अधिक सक्रिय हो जाता है। जबकि आपको अपने अंदर के आलोचक को ज्यादा तरजीह नहीं देनी चाहिए। क्योंकि वह काफी हद तक आपके अंदर भय, नकारात्मक विचार भरता है। सीधे तौर पर कहें तो आपके मन में जहर भरता है। वह आपके अंदर सत्य को समझने, परखने से पहले ही आपकी सोच पर हमला कर देता है। नकारात्मक अलार्म बेल शरीर को झकझोरने लगती है। ऐसे में बेहतर है कि जब दिमाग नकारात्मक संकेत आपको भेजना शुरू करे, उसे अनसुना कर दें। जैसे ही आप व्याकुलता महसूस करें, खुद को रोकें। चाहें तो जोर से खुद पर चिल्ला भी सकते हैं कि अब बस करो..। कवि रेनर मारिया रिल्के ने कहा है कि जो भी दिल में उलझा हुआ पड़ा है, उसके लिए धैर्य रखें..सवालों के साथ जिएं।


एक बार जब आपको पता चल जाए कि अंदर बैठा आलोचक अपना नकारात्मक खेल शुरू करने वाला है तो कुछ पल ठहर कर एक गहरी सांस लें। खुद को शाबाशी दें कि आपने इस आलोचक को रोकने का प्रयास किया है और गहरी सांस लेकर अपने दिमाग और शरीर को शांत करें। गहरी सांस आपको वर्तमान में रखने के अलावा मन को भी नियंत्रण में रखती है। अपनी आंख बंद करें, भटकावों को हटा दें, सांसों को दस गिनने तक अंदर-बाहर करें। आपका मन शांत हो जाएगा। रोज ऐसा करने से अपने अच्छे व बुरे विचारों से आप खुद-ब-खुद परिचित होने लग जाएंगे। मंथन करेंगे तो पाएंगे कि इससे तो केवल आपको ही नुकसान हो रहा है। जैसे ही ध्यान के जरिए बुरे विचार को बदलने की कोशिश करेंगे, यह आपके कर्म में शामिल हो जाएगा। नया संस्कार और आदत बन जाएगा। लेखक जेम्स बराज कहते हैं, ‘आज में जिएं। याद रखें कि वक्त कैसा भी हो, बीत जाता है। अपनी खुशी और गम दोनों में खुद पर काबू रखें।’ इस तरह अपने नकारात्मक विचारों को सकारात्मकता में बदलना आपके जीवन को एक नया एवं सुखद अनुभव देगा और आप संभावनाओं से भर जायेंगे। 

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