Analysis : आखिर सिंधिया का नाम आगे आने पर क्यों हो जाती है मध्य प्रदेश कांग्रेस में गोलबंदी

40 सालों से चली आ रही कांग्रेसी संस्कृति की वजह से नहीं उभर सका नया नेता. इस बार डॉ. गोविंद सिंह और बाला बच्चन के साथ आदिवासी चेहरे के तौर पर उमंग सिंघार और ओमकार सिंह मरकाम के नाम समाने आ रहे हैं.

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी (MP Congress Committee) के नए अध्यक्ष (New president) का नाम आने वाले कुछ दिनों में घोषित किया जा सकता है. अध्यक्ष पद के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) का नाम चर्चा में है. राज्य में उनके विरोधी नेता एक बार फिर साथ-साथ खड़े नजर आ रहे हैं. मुख्यमंत्री के नाम के चयन के वक्त भी सिंधिया विरोधी नेताओं की एकजुटता (Solidarity) के कारण ही कमलनाथ (Kamal Nath) राज्य के मुख्यमंत्री बन पाए थे. मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया (Deepak Bawaria) कहते हैं कि नामों का पैनल नेताओं से चर्चा (Discussion) करके बनाया गया है. इसमें सिंधिया के नाम का भी सुझाव (Suggestion) मिला है.

कांग्रेस में 40 साल से चल रही है सिंधिया विरोधी राजनीति 

मध्य प्रदेश कांग्रेस में सिंधिया विरोधी राजनीति चार दशक बाद भी बंद नहीं हुई है. माधवराव सिंधिया (Madhavrao Scindia) के कांग्रेस (Congress) में शामिल होने के बाद से ही उनके विरोधी राजसी छवि (Royal image) को निशाना बनाकर उन्हें राज्य की राजनीति (Politics) में आने से रोकते रहे हैं. 80 के दशक में सिंधिया के विरोध का नेतृत्व अर्जुन सिंह (Arjun Singh) (एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री) किया करते थे. अर्जुन सिंह के कारण ही दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे. दिल्ली की राजनीति में अर्जुन सिंह की मदद कमलनाथ किया करते थे.

कमलनाथ की निकटता संजय गांधी (Sanjay Gandhi) से थी. संजय गांधी के कारण ही शिवभानु सिंह सोलंकी वर्ष 1980 में मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे. वे शुक्ल बंधुओं (श्यामाचरण शुक्ल-विद्याचरण शुक्ल) के करीबी थे. उस समय माधवराव सिंधिया कांग्रेस में नए-नए आए थे. इस कारण वे मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं थे. राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के प्रधानमंत्री (Prime Minister) बनने के बाद माधवराव सिंधिया राज्य में ताकतवर नेता के तौर पर उभर कर सामने आए और शुक्ल बंधु लगातार कमजोर होते चले गए.

वोरा-सिंधिया की जोड़ी को मोती-माधव एक्सप्रेस का नाम दिया गया था

वर्ष 1978 में कांग्रेस के विभाजन के बाद श्यामाचरण शुक्ल ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़कर ब्रह्मानंद रेड्डी की कांग्रेस में चले गए थे. विद्याचरण शुक्ल, संजय गांधी के साथ रहे लेकिन बोफोर्स (Bofors scandal) के मामले में उन्होंने भी राजीव गांधी का साथ छोड़ दिया. श्यामाचरण शुक्ल की कांग्रेस में वापसी भी विद्याचरण शुक्ल के पार्टी छोड़ने के बाद ही वर्ष 1989 में हो पाई. इससे पहले मोतीलाल वोरा सर्वस्वीकार्य नेता के तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके थे. अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया था. वोरा, माधवराव सिंधिया के करीबी थे. उन्होंने सिंधिया से अलग होकर कोई गुट बनाने की कोशिश भी नहीं की. वोरा-सिंधिया की जोड़ी को मोती-माधव एक्सप्रेस का नाम दिया गया था. तब माधवराव सिंधिया रेल मंत्री थे. राज्य की राजनीति पूरी तरह से सिंधिया समर्थक और सिंधिया विरोधियों के बीच बंट चुकी थी.

आजादी के पहले से ही सिंधिया राजघराना काफी प्रभावशाली था

रियासत के लोग भी सिंधिया राजघराना का काफी सम्मान करते थे. इसका असर अब कम जरूर हो गया है, लेकिन लोगों ने अन्य राजे-रजवाड़ों की तरह नकारा नहीं है. देश की आजादी के बाद पहली बार सिंधिया परिवार का कोई सदस्य अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में चुनाव हारा है. हार ज्योतिरादित्य सिंधिया के खाते में आई है. हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा के आम चुनाव में सिंधिया गुना-अशोकनगर संसदीय सीट से चुनाव हार गए.

रियासत काल से है राघोगढ़ की ग्वालियर से दूरी

गुना पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (Digvijaya Singh) के प्रभाव वाला क्षेत्र भी है. दिग्विजय सिंह राघोगढ़ राज परिवार से हैं. रियासत काल से ही राघोगढ़ की ग्वालियर से दूरी बनी हुई है. यह दूरी निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में अभी भी दिखाई देती है. सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में राघोगढ़ का विधानसभा क्षेत्र नहीं आता है. राघोगढ़, राजगढ़ संसदीय सीट का हिस्सा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने रिश्तों को सुधारने की पहल भी की. वे कुछ महीने पहले राघोगढ़ के किले में गए थे. दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह (Jaivardhan Singh) के साथ उन्होंने समय भी बिताया. जयवर्धन सिंह, कमलनाथ मंत्रिमंडल में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के मंत्री हैं.

अर्जुन सिंह के निधन के बाद कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह का समर्थन जारी रखा. अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह भी विधानसभा और लोकसभा के दो चुनाव लगातार हार चुके हैं. वे भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के दावेदार हैं. दिग्विजय सिंह और राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री गोविंद सिंह मंगलवार की शाम अजय सिंह को मनाने के लिए उनके निवास पर भी गए. अजय सिंह नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं. विंध्य प्रदेश की राजनीति का बड़ा चेहरा है.

साफ और ईमानदार छवि बनती है सिंधिया की राह में रोड़ा

माधवराव सिंधिया और उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनीति में बेदाग चेहरा माने जाते हैं. देश की बिगड़ी रेल व्यवस्था को पटरी पर लाने का श्रेय भी माधवराव सिंधिया को ही दिया जाता है. हवाला मामले (Hawala scandal) में नाम सामने आने के बाद सिंधिया ने पी. व्ही. नरसिम्हाराव (P. V. Narasimha Rao) के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर राजनीति में नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया था. नरसिम्हाराव से मतभेद के चलते ही माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस बनाई थी और अर्जुन सिंह ने तिवारी कांग्रेस बना ली थी. हालांकि सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अर्जुन सिंह और सिंधिया वापस कांग्रेस में आ गए थे.

इसके बाद वर्ष 2001 में माधवराव सिंधिया का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया. ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके बाद ही राजनीति में आए. पिछले 18 साल से वे भी परंपरागत विरोधियों से जूझ रहे हैं. वर्ष 2013 में जब आदिवासी कार्ड के आधार पर कांतिलाल भूरिया को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तब भी उन्हें मध्य प्रदेश भेजने पर विचार किया गया था. साल 2018 के विधानसभा चुनाव के पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह रोकने के लिए उनके विरोधियों ने अध्यक्ष पद के लिए कमलनाथ का नाम आगे बढ़ाया था. तीन पीढ़ी के पारिवारिक रिश्तों के दबाव में ही सोनिया गांधी, कमलनाथ के नाम पर सहमत हुईं थीं. राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी के प्रयास भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बना पाए हैं.

रियासत के लोग भी सिंधिया राजघराना का काफी सम्मान करते थे. इसका असर अब कम जरूर हो गया है, लेकिन लोगों ने अन्य राजे-रजवाड़ों की तरह नकारा नहीं है. देश की आजादी के बाद पहली बार सिंधिया परिवार का कोई सदस्य अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में चुनाव हारा है. हार ज्योतिरादित्य सिंधिया के खाते में आई है. हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा के आम चुनाव में सिंधिया गुना-अशोकनगर संसदीय सीट से चुनाव हार गए.

रियासत काल से है राघोगढ़ की ग्वालियर से दूरी

गुना पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (Digvijaya Singh) के प्रभाव वाला क्षेत्र भी है. दिग्विजय सिंह राघोगढ़ राज परिवार से हैं. रियासत काल से ही राघोगढ़ की ग्वालियर से दूरी बनी हुई है. यह दूरी निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में अभी भी दिखाई देती है. सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में राघोगढ़ का विधानसभा क्षेत्र नहीं आता है. राघोगढ़, राजगढ़ संसदीय सीट का हिस्सा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने रिश्तों को सुधारने की पहल भी की. वे कुछ महीने पहले राघोगढ़ के किले में गए थे. दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह (Jaivardhan Singh) के साथ उन्होंने समय भी बिताया. जयवर्धन सिंह, कमलनाथ मंत्रिमंडल में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के मंत्री हैं.

अर्जुन सिंह के निधन के बाद कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह का समर्थन जारी रखा. अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह भी विधानसभा और लोकसभा के दो चुनाव लगातार हार चुके हैं. वे भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के दावेदार हैं. दिग्विजय सिंह और राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री गोविंद सिंह मंगलवार की शाम अजय सिंह को मनाने के लिए उनके निवास पर भी गए. अजय सिंह नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं. विंध्य प्रदेश की राजनीति का बड़ा चेहरा है.

साफ और ईमानदार छवि बनती है सिंधिया की राह में रोड़ा

माधवराव सिंधिया और उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनीति में बेदाग चेहरा माने जाते हैं. देश की बिगड़ी रेल व्यवस्था को पटरी पर लाने का श्रेय भी माधवराव सिंधिया को ही दिया जाता है. हवाला मामले (Hawala scandal) में नाम सामने आने के बाद सिंधिया ने पी. व्ही. नरसिम्हाराव (P. V. Narasimha Rao) के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर राजनीति में नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया था. नरसिम्हाराव से मतभेद के चलते ही माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस बनाई थी और अर्जुन सिंह ने तिवारी कांग्रेस बना ली थी. हालांकि सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अर्जुन सिंह और सिंधिया वापस कांग्रेस में आ गए थे.

इसके बाद वर्ष 2001 में माधवराव सिंधिया का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया. ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके बाद ही राजनीति में आए. पिछले 18 साल से वे भी परंपरागत विरोधियों से जूझ रहे हैं. वर्ष 2013 में जब आदिवासी कार्ड के आधार पर कांतिलाल भूरिया को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तब भी उन्हें मध्य प्रदेश भेजने पर विचार किया गया था. साल 2018 के विधानसभा चुनाव के पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह रोकने के लिए उनके विरोधियों ने अध्यक्ष पद के लिए कमलनाथ का नाम आगे बढ़ाया था. तीन पीढ़ी के पारिवारिक रिश्तों के दबाव में ही सोनिया गांधी, कमलनाथ के नाम पर सहमत हुईं थीं. राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी के प्रयास भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बना पाए हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया-Jyotiraditya Scindia
आखिर सिंधिया का नाम आगे आने पर क्यों हो जाती है मध्य प्रदेश कांग्रेस में गोलबंदी (फाइल फोटो)

सिंधिया को रोकने के लिए एक बार फिर सामने आया आदिवासी कार्ड

कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी का स्टार प्रचारक बनाया गया था. विधानसभा चुनाव में सिंधिया के प्रभाव वाले ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की 34 में से 28 सीटें कांग्रेस के खाते में गईं. सिंधिया का चेहरा युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है. इसका लाभ कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में मिला था. सिंधिया को मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर युवाओं में हताशा भी देखी गई थी. विपक्षी दल बीजेपी (BJP) को भी कांग्रेस पर हमला बोलने का मौका मिल गया. मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता (Spokesman) रजनीश अग्रवाल (Rajnish Agrawal) कहते हैं कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में युवाओं को धोखा दिया.

दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि सिंधिया का चेहरा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए सबसे ऊर्जावान चेहरा है. वे कहते हैं कि सिंधिया का भरोसा गुटबाजी में नहीं है. वे काम पर भरोसा ज्यादा करते हैं. सिंधिया की राह रोकने के लिए उनके विरोधियों द्वारा एक बार फिर आदिवासी कार्ड निकाला गया है. इस बार गृह मंत्री बाला बच्चन का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे आया है. वे निमाड़ क्षेत्र से आते हैं और कमलनाथ के समर्थक हैं. दूसरा नाम ओमकार सिंह मरकाम का है. एक अन्य आदिवासी नाम उमंग सिंघार का है. मरकाम और सिंघार दोनों ही मंत्रिमंडल के सदस्य हैं.

अध्यक्ष पद पर ग्वालियर-चंबल संभाग का दावा सामने आने के बाद डॉ. गोविंद सिंह का नाम सिंधिया विरोधियों ने आगे बढ़ाया है. डॉ.गोविंद सिंह, दिग्विजय सिंह के करीबी हैं. बाला बच्चन के पक्ष में झाबुआ विधानसभा के उप चुनाव को आधार बनाया गया है. आदिवासी सीट झाबुआ पर उप चुनाव कुछ दिनों में ही होना है.




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