संपादक’ शब्द का क्या अभिप्राय है ? उसकी भूमिका और कार्यों को आप किस रूप में देखते हैं ?

♦‘संपादक’ शब्द की व्याख्या की बजाय मैं उसके कार्य से अपनी बात शुरू करना चाहूंगा। जिस तरह हर व्यक्ति, समाज और देश का अपना एक खास व्यक्तित्व होता है, जिसे प्रोफाइल कहते हैं। उसी तरह हर अखबार, हर पत्रिका या टीवी न्यूज चैनल का भी अपना एक अलग व्यक्तित्व होता है। किसी पत्र-पत्रिका या चैनल के इस व्यक्तित्व को गढ़ने का दायित्व जिस व्यक्ति पर होता है, वह ‘संपादक’ है। हालांकि व्यक्तिगत गढ़ने या प्रोफाइल थोप सकता है। इसके लिए उसे सबसे पहले प्रबंधन से मिलकर उसकी नीतियां जानने का बुनियादी काम करना होता है। फिर जिस समाज, समय या कालखंड में एक प्रकाशन का दायित्व संभालता है, उस दौर की बुनियादी चुनौतियां क्या हैं, समाज की मनःस्थिति क्या है, इन दोनों के बीच तालमेल और संतुलन कायम करके उसे अखबार की नीति तय करनी होती है। इस काम को वह समाज, अखबार के संपादक और अखबार में काम करनेवालों के साथ तालमेल बैठाकर या संतुलन बनाकर ही कर सकताहै।
संपादक का अगर कोई निजी विचार या कनविक्शन या कोई अलग मान्यता हो, तो उसके लिए भी समाज और टीम के साथ तालमेल बनाना होता है। परन्तु इस तालमेल में संपादक के लिए पहली प्राथमिकता है समाज । कोई समाज जहां खड़ा है, वहां से उसे आगे ले जाने की बौद्धिक रहनुमाई बुद्धिजीवियों के साथ-साथ पत्रकार वर्ग भी करता रहा है। और संपादक इस भावना का प्रतिनिधित्व करता है। समाचार पत्र महज व्यवसाय नहीं है। यह बाजार का दौर है, फिर भी अखबार को प्रोडक्ट की संज्ञा देने वाले भूलते हैं कि पाठक इसकी कीमत चुकते हैं और पाठक कंटेंट के आधार पर कीमत देते हैं। विज्ञापन या व्यवसाय भी पाठकों की बड़ी तादाद के कारण बाजार से मिलता है। इसलिए पाठकों की दुनिया, पाठकों के हालात, पाठकों की मनःस्थिति एक अखबार के लिए सबसे महत्वपूर्ण है । व्यापक दृष्टि के तहत अगर समाज को आगे ले जाना हमारा प्राथमिक काम है तो स्वाभाविक रुप से समाज के हाशिये पर खड़े लोग, मसलन बहुतसंख्यक गरीब, आदिवासी, दलित, वंचित लोगों के जीवन में निरंतर बदलाव हो, प्रगति आए, यह संपादक के काम की एक कसौटी है । यह काम इस तरह भी संपादक को सम्पन्न करना है कि समाज के प्रभावी तबके के लोग या शासक वर्ग के लोग यह महसूस करें कि अगर अखबार यह काम न करे तो समाज में तनाव कायम होगा और समाज प्रगति नहीं कर पाएगा । साथ ही एक नागरिक समाज जो अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों के प्रति भी सजग हो, ऐसे समाज को तैयार करना भी अखबारों का काम है । मूलतः लोकतंत्र में अखबार सरकारों को उनकी मर्यादा, उनकी सीमा, उनके कामकाज का बेखौफ स्मरण कराए, उनकी फिसलन पर स्पष्ट नजर रखे और राजनीतिक दलों को समाज, संविधान और श्रेष्ठ सामाजिक मूल्यों के प्रति और अधिक जिम्मेदार बनाए, यह काम अखबारों का है ।
संपादक यह व्यापक दायित्व अकेले पूरा नहीं कर सकता है । इसलिए संपादक अपनी टीम का प्रतिनिधित्व करता है । वह टीम, जो संपादक के साथ मिलकर समाज, राजनीति, वैकल्पिक राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषमता, तनाव, सौहार्द्र, शिक्षा, दुनिया में हो रहे परिवर्तन वगैरह विषयों पर एक बेहतर दृष्टि और विजन के साथ काम कर सके । इस तरह संपादक अपनी पूरी टीम के साथ मिलकर उस सामूहिक विजन से अखबार का व्यक्तित्व बनाता है, उसका प्रोफाइल तय करता है । संपादन, अखबार की त्रुटियों पर गौर करने, समय के साथ चलने, बहुआयामी विषय उठाने, पाठकों से संवाद, अखबार के पत्रकारों की आचार संहिता तय करने जैसे अनेक रुटीन काम भी संपादक के माध्यम से ही सम्पन्न होते हैं । पर उसका मूल काम अखबार का व्यक्तित्व गढ़ना है, जिसे वह अपनी टीम के साथ मिलकर समाज और काल की चुनौतियों के अनुरुप पूरा करता है ।
♦ क्या संपादक की भूमिका और कार्य आज भी वही है या समय के साथ इसमें कोई बदलाव आया है। अगर बदलाव आया हो तो किस-किस दौर में, किस-किस तरह के बदलाव आए और इनकी क्या वजह रही ?
♦ दरअसल आज तो एक धारा है, जो संपादक को गैरजरूरी मानती है। उसका मानना है कि संपादक के बगैर अखबार बेहतर तरीके से चल, निकल और बढ़ सकते हैं। भारत के अखबारों में नए प्रयोगों का नेतृत्व ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ करता है। इस अखबार में पहले श्यामलाल या गिरिलाल जैन जैसे लोग थे या दूसरे अखबारों में एस. मूलगांवकर, अजीत भट्टाचार्जी, वी.जी. वर्गीय, अरूण शौरी, कुलदीप नैयर, एन.जे. नानपुरिया, प्रेम भाटिया, प्राण चोपड़ा, दुर्गा दास, चलपति राव, फेंक मोरेस जैसे लोग रहे हैं।और पीछे लौटें तो एक-से-एक दृष्टिसम्पन्न संपादक हुए। आजादी के बाद हिन्द में अज्ञेय, रघुवीर साहय, धर्मवीर भारती,मनोहर श्याम जोशी, अक्षय जैन, राजेन्द्र माथुर प्रभाष जोशी जैसे लोग हुए। मराठी में गोवंद तलवलकर या गुजराती में हरेन्द्र दवे या बांग्ला में गौरकिशोर घोष या अन्य राज्यों में या क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनेक ऐसे जाने-माने संपादक रहे, जिन्हें आज समाज श्रद्धा और विनय से याद करता है। उनकी भूमिका ने समाज में प्रगतिशील चेतना पैदा करने में मदद की। मूलतः इन दिग्गज पत्रकारों-संपादकों ने अपनी निजी गरिमा रखते हुए बेखौफ सवाल उठाए। जहां अन्याय होता दिखा, उसके प्रतिकार में खड़े रहे । चूंकि ऐसे लोगों का निजी जीवन इतना साफ-सुथरा, पारदर्शी और ईमानदार था कि वे पूरी व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाते थे । उनकी बातें गौर से सुनी जाती थीं ।
आज संपादक पद का क्षय खुद संपादकों की वजह से ज्यादा हुआ है । प्रबंधन तो बाद में आता है। आमतौर से यह धारणा थी कि भारतीय प्रेस ‘जूट-प्रेस’ है । देश के आजाद होते ही यह मामला स्वर्गीय फिरोज गांधी ने संसद में उठाया था कि भारतीय प्रेस बड़े औद्योगिक घरानों के कब्जे में है । फिर भी जिसे ‘जूट-प्रेस’ कहा गया, उसी ‘जूट-प्रेस’ पर भारतीय मानस सबसे अधिक यकीन करता था । वी.जी. वर्गीज ने सिक्किम के विलय के खिलाफ लिखा या इंदिरा-राजीव गांधी के जमाने में प्रेस ने भ्रष्टाचार के अनेक प्रकरण उजागर किए । धीरे-धीरे प्रेस ने अपने काम से एक विश्वास अर्जित किया कि प्रेस बेखौफ होकर गंभीर मुद्दों को उठाता है, ताकतवर से ताकतवर लोगों के खिलाफ वह खबरें छापता है, प्रेस को निडर होने की यह नैतिक ताकत समाज से मिली । आज भी आप प्रणव राय, राजदीप सरदेसाई, स्व.सुरेन्द्र प्रताप सिंह, विनोद मेहता वगैरह को देखें तो प्रेस की भूमिका का एक एहसास होता है । परन्तु बड़े पैमाने पर आज प्रेस की भूमिका संपादकों की वजह से बदल गई है । हालांकि इसमें अपवाद भी काफी मिलेंगे । अनेक योग्य ईमानदार और साहस के साथ काम करने वाले संपादक हिन्दी से लेकर अन्य भाषाओं में हैं । लेकिन हिन्दी जगत में, हिन्दी अखबारों की दुनिया में एक बड़ा परिवर्तन आया है । अब संपादक बनने के लिए योग्यता, बौद्धिक क्षमता या उसका ईमानदार होना गैरजरुरी चीज बन गए हैं । संपादक के चयन की मुख्य धारा है कि आप कैसे अखबार के प्रबंधन के लिए चीजों को मैनेज कर सकते हैं । आप किस राजनीतिक दखल या मदद से अखबार के प्रतिष्ठानों में कुर्सी पा सकते हैं । लाइजनिंग के काम में आप कितने माहिर हैं । प्रोफेशनल एक्सपर्टाइज अब संपादक बनने के लिए जरुरी नहीं है । अखबार में काम करने वाले बड़े पदों पर बैठे लोग अब खुद उद्योगपति बनना चाहते हैं और वे संपादक के रुप में अखबार का इस्तेमाल इसी उद्देश्य से करते हैं । इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे । यह बड़े समूहों में हो रहा है ।
दूसरी ओर आज संपादकों की कोई सोशल एकाउंटिबिलिटी नहीं रह गई है । खबरों का चयन संपादक अपने उद्योगपति बनने की दृष्टि से ही करते हैं । मसलन, जिस राज्य से अखबार निकल रहें हों, वहां के मुख्यमंत्री को किसी महत्वपूर्ण सर्वेक्षण में सबसे नाकाबिल माना जाता है, लेकिन उसकी खबर जो अखबार इस सर्वेक्षण के काम में लगा है, वही नहीं छापेगा । 1991 के बाद भारत में उदारीकरण के दौर ने अनेक संस्थाओं को गहराई से प्रभावित किया । अखबार जगत भी इसे अप्रभावित नहीं है । बाजार बनती दुनिया में माना जाने लगा है कि संपादक का काम मैनेजर भी कर सकता है । अनेक बड़े अखबार समूहों में संपादकों की छुट्टी भी कर दी गई और ब्रांड मैनेजर उनका काम संभालने लगे ।
परंतु पिछले तीन-चार वषों में इन बड़े अखबारों में भी एक बड़ा परिवर्तन आया है। मसलन, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने अपने कुछ संस्करणों में संपादकीय पेज को गैरजरूरी मानकर खत्म कर दिया था। पुनः उसे शुरु करना पड़ा है । किताबों पर एक पन्ना, गंभीर विषयों पर बहस, पुराने दार्शनिकों पर सामग्री प्रकाशन जैसी चीजें अब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में दिखाई देने लगी है । स्पष्ट रुप से जो अखबार ‘पेज-थ्री’ की संस्कृति का प्रधिनिधित्व करने वाला कहा जाता था, अब वह अंग्रेजी का एक बेहतर, गंभीर और बड़े समुदाय में पढ़े जाने वाला अखबार है । यह परिवर्तन उल्लेखनीय है । प्रतिस्पर्धा के इस दौर में समृद्ध कंटेंट ही अखबारों का भविष्य तय करेंगे और यह कंटेंट तय करने का काम समाज को अधिक नजदीक से समझने वाला संपादकीय समूह ही कर सकता है । उपभोक्ताओं से ताल्लुक रखने वाला बाजार या बाजार के विशेषज्ञ मैनेजर नहीं कर सकते ।
♦ हर किस्म के संगठन में कोई लीडर या सीईओ होता है । क्या अन्य संस्थाओं के लीडर या सीईओ की तरह ही अखबार में संपादक होता है या उससे कुछ अलग किस्म की भूमिका होती है ? इसमें क्या फर्क और यह फर्क क्यों ?
♦ ग्लोबल बनती दुनिया में बाजार सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया है । बाजारों के इर्द-गिर्द ही चीजें हो रही हैं । बाजार को नियंत्रित और संचालित करने का दर्शन प्रबंधन कहलाता है । इसलिए यह प्रबंधन का दौर भी है । जैसे पहले विचारों का दौर होता था । विचार चाहे अराजकतावादी हो या समाजवादी, साम्यवादी हो, मध्यमार्गी या फासिस्ट हों या कोई अन्य हर दौर में उन विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सम्मानित और व्यस्त सलाहकार हैं । प्रबंधन की यह दुनिया मानती है कि किसी भी कंपनी या इकाई को सक्षम तरीके से चलाने के लिए एक विजनरी सीईओ यानी चिफ एक्जीक्यूटिव आफिसर चाहिए। इस सीईओ के लिए मापदंड या कसौटियां पूर्व निर्धारित हैं। यानी कम से कम खर्च पर अधिक से अधिक मुनाफा, लगातार इन्नोवेटिव तरीकों से मुनाफा बढ़ाना।
इस तरह एक सीईओ पूरी तरह बाजार के कारकों की देन है और इसके पीछे मैनेजमेंट का दर्शन है। लेकिन अखबार का संपादक इससे भिन्न है। हालांकि आज एक संपादक को मैनेजर की तरह भी काम करना है। प्रतिस्पर्धा के दस दौर में उसे सुनिश्चित करना है कि टेक्नालाजी के बेहतर उपयोग, कम से कम खर्च में वह कैसे बेहतर अखबार निकाल ले। एक संपादक को आज अखबारों की दुनिया को जानना अनिवार्य ह। बाजार के किन कारकों से अखबार का बिजनेस-व्यापार प्रभावित होता है, आज के बाजार के कौन-से तत्व अखबार को बढ़ाते-घटाते हैं, उसके प्रतिस्पर्धी अखबार किन-किन बाजार योजनाओं को अपनाकर प्रसार, व्यवसाय या अखबार की प्रोफाइल तय कर रहे हैं, आज यह सब एक संपादक को जानना जरुरी है। बाजार और अखबारी व्यवसाय की अधिकाधिक सूचनाओं से वह सम्पन्न नहीं है तो संपादक प्रभावी नहीं हो पाएगा। अखबार किस विजन के तहत निकले, उसका दर्शन और उसकी पहचान क्या हो, यह सब समाज और बाजार की सूचनाओं से ही संपादक तय करता है। अपने समय की चुनौतियों से वह महज लाभ न कमाए बल्कि उन सामाजिक चुनौतियों के प्रति एक सजग और सकारात्मक दृष्टि विकसित करने की कोशिश होनी चाहिए। इस तरह अन्य संस्थाओं के किसी लीडर या सीईओ की तुलना में अखबार के संपादक की भूमिका भिन्न है।
♦ क्या संपादक आज भी अपरिहार्य है ? संपादक संस्था की अपरिहार्यता के बावजूद उसे गौण करने के पीछे किसके क्या हित रहे होंगे और उससे अखबार को अंततः किस किस्म के नुकसान उठाने पड़े या पड़ेंगे ?
♦ मेरे निजी विचार में संपादक के बगैर अखबार की कल्पना अधूरी है । संपादक नितांत अपरिहार्य इकाई है। वही प्रबंधन की नीतियों और अपने समाज की चुनौतियों के बीच तालमेल बिठाकर अखबार और समाज को आगे ले जाने की पहल करता है। संपादक कई सवालों पर निष्पक्ष तरीके से अकेले भी खड़ा होता है। इसलिए वह सरकार, प्रभावी ताकतों के साथ ही प्रबंधन की दृष्टि में भी कई बार अनावश्यक दिखाई देने लगता है। राह के रोड़े की तरह। इन सभी तत्वों ने मिलकर इस पद के महत्व को कम करने की कोशिश की है। आज बड़े पैमाने पर मालिक ही संपादक की भूमिका में है। ऐसे मालिक, प्रबंधन और बाजार को कुशलता से नियंत्रित या संचालित करने में माहिर हो सकते हैं। लेकिन अखबार की दुनिया भिन्न है। कंटेंट मैनेजमेंट में ये मालिक उतनी ही दक्ष नहीं हैं और अपने हितों को पूरा करने के लिए वे पग-पग पर कंटेंट से समझौता करते हैं, सामाजिक हितों के आगे वे निस्वार्थों को प्राथमिकता देते हैं। कुछेक मालिक-संपादक भी अच्छे हुए हैं या हो सकते हैं, पर यह अपवाद जैसा ही है । मैं ऐसा नहीं कहता कि गैर-मालिक संपादक ऐसा बिल्कुल नहीं करते । वे भी सत्ता प्रतिष्ठान से तरह-तरह के लाभ लेते हैं। फिर भी तुलनात्मक तौर पर उन्हें अपने सामाजिक दायित्व का एहसास होता है। उसका दबाव होता है। यही कारण है कि जो संपादक हितों की राह में आड़े आया । उसे प्रबंधन से मिलकर सरकार या शासक वर्ग या उद्योगपति सबने महत्वहीन बनाने की कोशिश की। जो संपादक मालिक या सरकार या प्रभावशाली लोगों के हित साधने के लिए आज तैयार है, वह खुद भी बड़े पैमाने पर अपने हित और स्वार्थ पूरे कर रहा है। लेकिन इससे भविष्य में बनने वाले समाज पर जो गहरा असर हो रहा है, उसे समझने के लिए कोई तैयार नहीं है। संपादक पर खत्म होने का नुकसान अखबार, संपादक और देश सबको उठाना होगा। यहां संपादक कमजोर है या अपनी दुनिया समृद्ध करने की दौड़ में शामिल है, वहां आप देख सकते हैं कि किस तरह सामाजिक हितों के सवाल लगातार गौण होते जा रहे हैं। संपादकविहीन अखबारों में पैसा देकर खबरें या फोटो छपवाने की बातें प्रमुखता से छपीं। चुनाव के दौरान अनेक बड़े अखबारों ने ‘एडिटोरियल’ छापकर पैसे लिए। ‘पेज थ्री’ नामक जिस पत्रकारिता का विकास हुआ, वह संपादकविहीन से ही शुरू हुआ । मैं यह नहीं कहता कि संपादकों के रहते ऐसे काम नहीं होते या नहीं हो रहे । होते हैं या हो रहे हैं। पर समाज का उस पर दबाव है। पाठकों का दबाव है। जब ब्रांड मैनेजर अखबार निकालने के काम में लगेगा, तो वह हर खबर को भी पैसे की दृष्टि से तौलेगा या खरीदेगा-बेचेगा। इससे किस तरह का ट्रेंड विकसित होता दिख रहा है ? सक्षम वर्ग, शासक वर्ग और पैसे वाले वर्ग की ही खबरें प्रमुखता से छपेंगी, आत्महत्या करते किसानों की स्थिति ऐसे समाज में या संपादकविहीन अखबार में हाशिये पर ही रहेगा। संपादकविहीन अखबार महज कारोबारी खबर तक ही सिमट जाएंगी।
♦ बदलते वक्त के साथ खुद संपादक को अपनी भूमिका में क्या बदलाव लाने चाहिए और अधिकांश संपादकों ने इसे समझा या नहीं ?
♦ हिन्दी पत्रकारिता के संदर्भ में इस प्रश्न पर गौर करना प्रांसगिक होगा। मेरी निजी धारणा है कि हिन्दी पत्रकारिता में कम लोगों ने बदलती दुनिया के साथ सामंजस्य बनाने की कोशिश की है। इक्कीसवीं सदी की दुनिया भिन्न तरीके से बन रही है। बदलाव की गति बहुत ही तेज है। 1991 के आसपास दुनिया की जानी-मानी पत्रिका ‘द अकोनोमिस्ट’ की एक पत्रकार ने एक पुस्तक लिखी थी, ‘दे डेथ ऑफ डिसटेंस’ । इसमें इसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह तकनीक या संचार माध्यमों के आर्विभाव या तेज यातायात ने दुनिया को व्यापक पैमाने पर बदला है। इस बदलाव के मनोवैज्ञानिक सामाजिक, आर्थिक कई पहलू है। ग्लोबलाइजेशन से एक नया समाज उभर रहा है, नई अर्थव्यवस्था उभर रही है । इन चीजों को गहराई से जानने-समझने वाले लोग आज हिन्दी में कितने पत्रकार है ? यह आर्थिक समृद्धि से संचालित दौर कहा जाता है। लेकिन किस तरह की नई अर्थव्यवस्था उभर रही है। इसकी जानकारी कितने हिंदी संपादकों और पत्रकारों को है। इन बदलावों पर लगातार अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों लिखी जा रही हैं। लेकिन क्या अखबारनवीस उन पुस्तकों को पढ़ते हैं ? दरअसल अपने समय और काल को समझकर ही कोई संपादक पत्रकारिता में अपनी भूमिका निभा सकता है। संपादकों और अखबारनवीसों में पढ़ने की इस प्रवृत्ति का बड़े पैमाने पर क्षय हुआ है। बेहतर होता अगर संपादक और हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े अखबारनवीस बदलते समय को गंभीरता से समझने की कोशिश करते । 1980 तक स्थिति भिन्न थी। हिन्दी पत्रकारिता में बड़े पैमाने पर ऐसे पत्रकार आते थे, जिसकी व्यापक दृष्टि होती थी और वे लगातार अलग-अलग किस्म के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विषयों से जुड़ा साहित्य पढ़ा करते थे। फिलहाल यह प्रवृत्ति कमजोर हुई है।
♦ पाठकों ने संपादक को किस नजर से देखा है ? विकसित, पाश्चात्य देशों के पाठक भी संपादक को उसी निगाह से देखते रहे हैं जैसे भारतीय पाठक देखते हैं या इसमें फर्क है। भारतीय पाठक आज भी उसीनजर से, उसी अपेक्षा से संपादक को देखता है या उसमें कोई बदलाव आया है ?
♦ भारतीय परिवेश में संपादकों को समाज और लोगों ने भिन्न दृष्टि से देखा है। आजादी की लड़ाई में गाधी, तिलक और अरविंद जैसे लोगों ने भी पत्रों का संपादन किया। मेरी निजी मान्यता है कि ऐसे लोग मूलतः पत्रकार नहीं थे। ये सहस्त्रब्दियों में पैदा में पैदा होने वाले दृष्टि संपन्न लोगों में से थे। इन्होंने अपने व्यापक काम के लिए पत्रकारिता को हथियार बनाया और पत्रकारिता की कसौटी भी इन महापुरुषों ने तय की। इनके अलावा शुद्ध संपादकों की एक अलग परंपरा है, जो मुलतः पत्रकार थे। मैं उन्हें महर्षि संपादक या पत्रकारिता का पथप्रदर्शक मानता हूं । इस परंपरा में गणश शंकर विद्यार्थी, विष्णुराव पराडकर, गर्दे जी, अंबिकाप्रसाद वाजपेयी, माखनलाल चतुर्वेदी वगैरह थे। यह सूची लंबी है। उन दिनों अंग्रेजी या बांग्ला और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी ऐसे संपादकों की बड़ी सूची मिलती है। इन्हीं लोगों ने अपने कामकाज से संपादकों की एक ऐसी छवि पेश की, जिसे समाज ने आदर के साथ देखा और सम्मान दिया। उस युग में पत्रकारिता के इन धारा प्रवर्तकों के कारण प्रेरित होकर अनेक मूर्धन्य संपादक और पत्रकार निकले । जिले-जिले में भी उन दिनो ऐसे संपादक और पत्रकार हुए, जिन्होंने उन महान लोगों से प्रेरित होकर स्थानीय स्तर पर भी पत्रकारिता की एक गौरवमयी छवि बनाई इससे ही यह धारणा निकली कि संपादक या पत्रकार सत्ता के आगे नहीं झुकते । सच को वरीयता देते हैं, सामाजिक हितों के लिए निजी लाभ की परवाह नहीं करते । पत्रकारिता को अपनी निजी प्रगति का हथियार नहीं बनाते। उन दिनों यह सोचना भी नामुमकिन था कि कोई पत्रकार या संपादक अपनी कुर्सी का उपयोग सत्ता पाने या ब्लैकमेल के जरिए पूंजी कमाने के लिए करेगा।
इस तरह भारतीय पत्रकारिता की बुनियाद बड़े आदर्शों, सर्वश्रेष्ठ मूल्यों और एक व्यापक जीवनदृष्टि से समृद्ध हुई । यह भारतीय पत्रकारिता का गौरवपूर्ण अतीत है। आजादी के बाद भी यह परंपरा अपवाद नहीं बनी। लेकिन पिछले दस-पन्द्रह वर्षों के दौरान भारत में पत्रकारिता और और पत्रकार अपनी साख खोते नजर आ रहे हैं। आज देश में बड़े पैमाने पर जनमत सर्वेक्षण होते हैं। इन रिपोर्टों में यह तथ्य सामने आया है कि जनता की निगाह में आज पत्रकार और पत्रकारिता दोनों को भ्रष्ट संस्थाओं की सूची में शामिल किया जा रहा है। यह निराधार नहीं है। अगर अपने आसपास हम पत्रकारिता को देखें और संपादकों के काम पर नजर डालें तो लगेगा कि भारतीय पत्रकारिता का मौजूदा दौर क्षय या पतन का है। दंगा कराने वाले संपादक बनते हैं, ब्लैकमेलिंग में भूमिका निभानेवाले पत्रकार बनते हैं। सिर्फ कार्ड के लिए बिना वेतन काम करने वाले लोग पत्रकार बनते हैं और बदले में उस कार्ड से समाज को ब्लैकमेल करते हैं । आज की तारीख में मौजूदा पत्रकार बौद्धिक या नैतिक रहनुमा नहीं रह गया है । स्वाभाविक है कि समाज उसे दागदार या भ्रष्ट की सूची में ही मानेगा । आश्चर्य है कि पत्रकारिता में इस गिरावट पर कोई चिंता नहीं है। हम राजनीति में, उद्योग में, संस्कृति में या सामाजिक जीवन में पतन का रोना रोते हैं, लेकिन अपने ही प्रोफेशन को पतनोन्मुख होते देखकर हम बिल्कुल चिंतित नहीं हैं।
आज जरूरत है कि एडिटर्स गिलड या प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्था को सशक्त बनाने के लिए पत्रकार समूहों या जाने-माने संपादको की और से कोशिश हो। फिर सरकार एवं अन्य राजनीतिक दलों से बातकर इन संस्थाओं को कानूनी ढंग से मजबूत किया जाए। इन ससंस्थाओ को यह अधिकार मिलना चाहिए कि संपादकों के चयन में संबंधित अखबार घरानों से मिलकर वे संपादकों और पत्रकारों के चयन में पारदर्शीं कसौटियां तैयार कराएं, संपादकों या पत्रकारो का चयन योग्यता के आधार पर होना सुनिश्चत कराएं। यह भी अनिवार्य किया जाना चाहिए कि संपादक अपनी और अपने परिवार की संपत्ति का विवरण अपनी संस्था और प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड को दें। पत्रकारों, संपादको की आचार संहिता तय होनी चाहिए। यह कठिन काम है। लेकिन इसके बगैर पत्रकारिता की नैतिक आभा वापस नहीं आने वाली। व्यवसाय की दृष्टि से पत्रकारिता बहुत बड़ी हो सकती है, लेकिन नैतिक दृष्टि से वह साख खोती जा रही है।
विकसित और पश्चिमी देशों में भी पत्रकारों को लोग मित्र, मार्गदर्शक और एक नैतिक ताकत के बतौर देखते रहे हैं। यूरोप में अखबारों की परंपरा या अमेरिकी अखबारों में काम, मसलन वाटरगेट प्रकरण को लोग अब भी भूले नहीं हैं। दरअसल समाज या भारतीय पाठक संपादक या पत्रकारिता को आज भी एक उम्मीद और अपेक्षा की दृष्टि से देखता है। वह मानता है कि राजनीति में पतन हुआ है तो दूसरा दीप-स्तंभ उसे तथ्यों से रू-ब-रू कराएगा, बेखौफ होकर हकीकत बताएगा। लेकिन पत्रकारिता में आज उल्टी धारा चल रही है। समाज के ताकतवर और शासकवर्ग लोगों के साथ संबंध बनाना संपादकों और पत्रकारों का मकसद हो गया है। यह बड़ा खतरनाक और गंभीर गठजोड़ है। पूंजी, सरकार, नौकरशाही और पत्रकारिता का गठजोड़ हिन्दी इलाकों में कई जगहों पर साफ दिखाई देता है। लेकिन सब कुछ स्वच्छंद तरीके चल रहा है। न कोई अंदरूनी अकांउटीबिलिटी है और न इसे ठीक करने की कोशिश। सब कुछ भगवान भरोसे है। इससे संपादक या पत्रकारिता लोगों की निगाह में संदिग्ध बनेगी ही।
♦ ऐसे में आखिरकार संपादक का भविष्य क्या है ?
♦ पारंपरिक तौर पर संपादक का पुराना स्वरूप अब नहीं रहनेवाला । आजादी के बाद संपादक सिर्फ विचार का प्रतीक दिख रहा था। अखबार के सर्कुलेशन, विज्ञापन और प्रबंधन से उसका कोई सरोकार नहीं था। बल्कि यह स्थिति थी कि जो व्यक्ति संपादकीय का कोई एक काम देखता था, उसे संपादकीय के ही दूसरे कामों में अरुचि होती थी। अब वह दौर नहीं रहा। संपादक को अपने पेशे के व्यवसाय की दुनिया के बारे में भी जानना होगा, समाज को भी अधिकतम जानना-समझना होगा और विचारों की दुनिया से भी ताल्लुक रखना होगा। लेकिन इन दिनों उभरते उपभोक्तावादी समाज या मध्य वर्ग के बड़े बाजार के लिए निकलते अखबारों से बाजार ही प्रमुख होता दिख रहा है। अगर बाजार प्रमुख हुआ, तो ऐसे तबकों के लिए निकलने वाले अखबारों में संपादक की जरूरत नहीं रह जाएगी। बिजनेस मैनेजर या ब्रांड मैनेजर बाजार और समाज के बीच संतुलन बनाने का काम करेंगे। परन्तु जब भी अखबार अपने मूल स्वरूप की ओर लौटेंगे यानी समाज में चेतना और स्पंदन पैदा करने का काम भी करेंगे, तब उन्हें विचारों से भी जुड़ना होगा । विचारों से जुड़ने का काम तो संपादक ही कर सकता है। हां, उस संपादक को अपने कालखंड की चीजों का सम्यक ज्ञान होना जरूरी है।

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