कोरोना के दौर में पत्रकारिता, यह हमारे जीवन की सबसे बड़ी कहानी होगी

आप अपने स्तम्भ के लिए गेब्रिएल गार्सिया मारखेज से शीर्षक तभी चुरा सकते हैं जब आप लापरवाह, यहां तक कि गुस्ताख़ और थोड़े सनकी भी हों. और हकीकत यह है कि हम पत्रकार लोग आम तौर पर तीनों होते हैं. इन और दूसरी कमजोरियों के लिए आम तौर पर अगर हमें माफ कर दिया जाता है तो इसलिए कि ज़्यादातर लोग जानते हैं कि हम कहां से आ रहे होते हैं. इतने वर्षों बल्कि दशकों के अपने पत्रकारीय जीवन में किसी ने मेरे साथ रूखा या असभ्य व्यवहार नहीं किया, चाहे उनमें से किसी को मुझसे नाराज होने की वजह क्यों न रही हो.

दंगों, बगावतों, आपदाओं, चुनाव अभियानों के दौरान हम पत्रकारों ने पाया है कि लोग हमारे साथ आम तौर पर अच्छा और सम्मानजनक व्यवहार करते हैं. यहां तक कि उजड्ड लोग भी, जिनका काम हत्या करना ही है, अक्सर हमें भोजन कराते हैं, सुरक्षा देते हैं. इनमें बेशक कुछ अपवाद भी होते हैं. चोरों में भी सम्मान की भावना होती है.

यह सब कहां से आता है? इस विशाल और विविधता से भरे देश के एक अरब से ज्यादा लोगों को किसने सिखाया कि पत्रकार उनके लिए महत्वपूर्ण हैं? कि पत्रकार ऐसे भले लोग हैं जो उनके जीवन के बारे में जो खबरें देते हैं, या वे जो राजनीतिक विचार रखते हैं उन पर भरोसा किया जा सकता है. आप चुनाव अभियानों के दौरान यात्रा करेंगे तो आपको पता चलेगा कि लोग जिन पत्रकारों से कभी परिचित नहीं हुए उनके प्रति वे कितने स्वागत का व उदारता का भाव रखते हैं. गरीब से गरीब गांवों की महिलाएं भी पत्रकारों से किस तरह खुल कर बात करने लगी हैं. भारत के लोगों और उनके पत्रकारों के बीच का यह सामाजिक करार अनूठा है. इसकी ठोस वजह उनका यह विश्वास है कि हम अपना काम बहुत कर्मठता और साहस से करते हैं. यही वजह है कि जब सरकार या पुलिस उनकी बात नहीं सुनती तो देशभर में पीड़ित लोग सबसे पहले मीडिया से ही संपर्क करते हैं.

आज जब हम कोरोनावायरस के खतरे के रूप में अपने जीवन की शायद सबसे बड़ी खबर से रू-ब-रू होने वाले हैं तब हमसे लोगों की ऐसी ही अपेक्षाएं हैं. भारतीय पत्रकारिता परिवार के हम लोगों के लिए यह सबसे बड़ी परीक्षा होने वाली है. भारतीयों की अगली पीढ़ियां हमें इस कसौटी पर कसेगी. यह वक़्त है पहले विश्वयुद्ध में सैनिकों की भर्ती के लिए जारी किए उस ब्रिटिश पोस्टर को याद करने का, जिसमें यह सवाल पूछा गया था—‘डैडी, आपने महायुद्ध में क्या किया?’

यह एक मारक वैश्विक महामारी है. हर देश और हर व्यक्ति अपनी ही समस्याओं से घिरा है. गुरुवार को देश के नाम अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि आज कोई देश किसी दूसरे देश की मदद करने की स्थिति में नहीं है.

भारत भी इस मामले में अकेला है. हमारा देश बेहद जटिल, और हम लोगों के मुक़ाबले कम साधन संपन्न वंचितों की भारी तादात वाला देश है. हम भारतीय पत्रकारों को सम्मान और स्वतंत्रता सबसे बड़े वरदान के रूप में स्वभावतः हासिल है. हमें याद रखना है कि मैंने ऊपर जिस सामाजिक करार या दायित्व की बात की है उसका स्रोत क्या है. प्रेस की आज़ादी किसी कानून या संविधान में शायद ही दर्ज है. अनुच्छेद 19 हर नागरिक के लिए समान रूप से लागू है और वह हम पत्रकारों को कोई विशेष अधिकार नहीं देता.

इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी तक हम इस स्वतंत्रता को स्वतः हासिल नेमत मानते रहे. जब उन्होंने यह सब छीन लिया था तब कोई रास्ता नहीं नज़र आता था. कोर्ट का रास्ता भी नहीं. आज के मुक़ाबले कहीं ज्यादा गरीब और अनपढ़ ये भारत के लोग ही थे जिन्होंने महसूस किया कि इंदिरा गांधी ने उनसे और चीजों के साथ-साथ प्रेस की आज़ादी भी चुरा ली है. कि यह उनकी सबसे बुरी चाल थी. ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि आगे कोई सत्ता दोबारा यह करने की हिम्मत करे. उस सामाजिक करार का स्रोत यही है. यह भारतीय पत्रकारिता के लिए वैसा ही पहला संशोधन है जैसा भारतीय संविधान का संशोधन होता है.

अगर लोग हमारी आज़ादी को इतनी तवज्जो देते हैं और उसकी रक्षा करते हैं तो वे यह भी आंकेंगे कि हम इस सबके काबिल हैं भी या नहीं.

मैं अपने साथी पत्रकारों को अपनी आशंकाएं जाहिर करते हुए सुनता हूं. कोई भी, अगर वह समझदार है, आशंकाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता. डरना अच्छा भी है, और आत्मरक्षा तो एक अहम सहज प्रवृत्ति है. कहा भी गया है कि जान है तो जहान है. कोई भी लापरवाही नहीं बरत सकता. उथल-पुथल वाले और हिंसाग्रस्त इलाकों में खतरों के खिलाड़ी वाली भूमिका में काम करते हुए मुझे जो अनुभव हासिल हुए उन्होंने मुझे यही सिखाया है. न्यूज़रूम में बैठा कोई भी समझदार लीडर किसी को बेवजह खतरे में डालने की शायद ही सोचेगा.

लेकिन हम पत्रकार हैं. जब हमारे जीवन की सबसे बड़ी घटना घट रही है, एक अरब से ज्यादा लोग हमारे मुक़ाबले कहीं ज्यादा डरे हुए और कहीं कम सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. उनकी यही अपेक्षा होगी कि हम उनके आसपास रहें, उन पर नज़र रखें, उनकी खबर देते रहें, रिपोर्टिंग और एडिटिंग करते रहें, अगली पीढ़ियों के लिए इस सबको रेकॉर्ड करते रहें, और नाइंसाफ़ियों एवं सरकार की खामियों को उजागर करते हुए खतरे की घंटी बजाते रहें. इस दुष्ट कोरोना वायरस के कारण आई आपदा जैसी परिस्थितियों में इंसाफ और इतिहास की मांगों को पूरा करने की पहली ज़िम्मेदारी हम पत्रकारों की ही होती है.

अगर हम इसमें नाकाम रहते हैं तो यह इतनी भारी नाकामी होगी कि हमें खुद को पत्रकार कहना भी छोड़ देना पड़ेगा. ध्यान रहे कि हममें से कुछ अगर नाकाम भी होते हैं तो हर कोई नाकाम नहीं होगा. हमारे पेशे के कुछ सम्माननीय लोग जरूर चमकेंगे. इस दौर के कुछ ऐसे पत्रकार जरूर उभरेंगे जिन पर भावी पीढ़ियां फख्र करेंगी. जो पीछे रह जाएंगे उन्हें भी आसानी से नहीं भुला दिया जाएगा. बस इतना होगा कि लोग उन्हें उस तरह नहीं याद करेंगे जिस तरह वे याद किया जाना चाहते होंगे.

मैं हमेशा इस बात में यकीन रखता हूं कि कोई भी आपदा जिस तरह शुरू होती है उससे अंततः ‘कम घातक’ ही साबित होती है. सुनामी के सिवा हर आपदा के मामले में मेरा यह यकीन सही साबित हुआ है. मैं तो यही कहूंगा कि हम सब इस संकट को पार करेंगे और बाकी जीवन इसकी कहानियां सुनते रहेंगे. हम पत्रकार लोग तिलचट्टे के समान होते हैं, और यह कहते हुए मेरा इरादा उस बेचारे कीड़े का अपमान करना नहीं है. हम तो बस उसकी तरह हर हाल में ज़िंदा रहेंगे.

इस संकटपूर्ण सप्ताह में न्यूज़रूम में किसी ने मुझसे एक अच्छा सवाल किया— अगर हालत सचमुच बहुत बुरे हो गए और हममें से कुछ लोग खबर देते हुए न रहें तब क्या होगा? इसका सीधा-सा जवाब यही हो सकता है कि ऐसी असंभव घटना घट भी जाए तो भी कुछ पत्रकार होंगे जो खबर देते रहेंगे. पत्रकारिता अपना काम करती रहेगी.

प्रधानमंत्री ने देश के नाम अपने संदेश में दो बार कहा कि डॉक्टरों, अस्पताल के कर्मचारियों, सरकारी अफसरों आदि की तरह मीडिया भी आवश्यक सेवाओं में शामिल है. मीडिया को आवश्यक सेवाओं में शामिल करना एक सुखद बदलाव है. अब तक जिन दशकों में हम काम कर रहे थे, उसमें हमें महामारी जैसा माना जाता था. लेकिन हमें खुद यकीन होना चाहिए कि हम महत्वपूर्ण हैं और एक आवश्यक सेवा देते हैं. हमारा स्वाभिमान, हमारी शान, हमारा नियति बोध, सब कुछ इस एक आस्था से निकलता है कि हम अहमियत रखते हैं. सत्ता से हमारा मतभेद है, और हमेशा रहेगा. और यह किसे नहीं होता, किस लोकतंत्र में नहीं होता?

जरा डोनाल्ड ट्रंप पर गौर कीजिए, जो अमेरिका के सबसे अच्छे पत्रकारों और ग्लोबल मीडिया के महान संस्थानों की हमेशा लानत-मलामत करते रहते हैं. या बीबीसी से प्रेरणा लीजिए, जिस पर मारग्रेट थैचर ने फाकलैंड युद्ध के बीच में ही हमला किया था कि वह देशभक्त नहीं है और दोनों पक्षों को एक ही तराजू पर तौल रहा है. इसके जवाब में बीबीसी रेडियो के प्रमुख रिचर्ड फ्रांसिस ने सीधा जवाब दिया था कि ‘बीबीसी को मौजूदा कंजरवेटिव ब्रिटिश सरकार से देशभक्ति का कोई सबक सीखने की जरूरत नहीं है. पोर्ट्समाउथ में जो विधवा हुई और ब्यूनस आयर्स में जो विधवा हुई, दोनों में कोई फर्क नहीं है.’

हम सरकारों से सवाल करते रहेंगे, उन्हें परेशान करते रहेंगे. वे हम पर हमला करेंगी. यह खेल चलता रहेगा. यह टकराव बदलते निज़ाम के मुताबिक तीखा और तल्ख होता रहेगा. लेकिन आज जो आपदा आई है उसमें हम सबको इस तरह की चिंताओं को परे कर देना चाहिए. इसलिए, कमर कस कर तैयार हो जाइए. यह कोरोना युग पत्रकारिता के लिए ऐसी चुनौती लेकर आया है जैसी उसे पहले कभी नहीं मिली थी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *