लेख – पत्रकारिता की पांच आधार शिलाएं

पत्रकारों का महान दायित्व हैजो पत्रकार महीनेदरमहीनेहफ्तेदरहफ्तेदिनरातसाजोसामान जुटाकर नेताओं को बिना किसी किस्म की जवाबदेही के अपनी कुर्सी पर बनाए रखने के लिए लेख पर लेख लिखते हैंया फलां नेता या फलां सरकार के गुणगान करने में रात-दिन एक कर देते हैं, या, उनकी काली करतूतों के खिलाफ सबूतों को नजरंदाज करते हैं, ऐसे पत्रकार दरअसल भ्रष्टाचारी, जन-विरोधी और अनैतिक सरकारों के हिमायतियों की गिनती में आते हैं.

ऐसे पत्रकार टीवी माध्यम के प्राइमटाइम एंकर, अखबार के संपादक या बीट रिपोर्टर में से कोई भी हो सकते हैं. समूचे इतिहास में राजनेताओं और सत्ता में बैठे तमाम महानुभाव मीडिया और पत्रकारों को पालतू बनाने को जरूरी मानते आए हैं क्योंकि उनके पास वह ताकत है जिसकी शिनाख्त रूजवेल्ट ने अपने कथन में की थी. कुछ देशों में, अन्य देशों के मुकाबले राजनेता — मीडिया और पत्रकारों को वश में रखने में ज्यादा कामयाब रहे हैं. लेकिन सत्ता पर काबिज एक शक्तिशाली व्यक्ति किसी पत्रकार को किस हद तक वश में कर सकता है, यह बात बहुत हद तक उस पत्रकार विशेष पर भी निर्भर करती है. 

अपने समकालीन समय की बात करने से पहले, चलिए कुछ समय रूजवेल्ट पर ही बिताते हैं. 1904 में पत्रकारिता के पेशे को इतने चमकीले शब्दों में बयान करने के बाद रूजवेल्ट ने उस वक्त क्या किया, जब किसी तेज तर्रार पत्रकार ने एक ऐसी कहानी बयान कर दी, जिसमें उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया था?

1909 में रूजवेल्ट को चुनौती देने वाला पत्रकार कोई और नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध जोसेफ पुलित्जर था. ‘न्यू योर्क वर्ल्ड’ नामक अपने अखबार में उन्होंने ‘पनामा कनाल’ के निर्माण के दौरान करीब 4 करोड़ डालर की रकम के गायब हो जाने की खबर छापी. उन पत्रकारों के अनुसार, जिन्होंने उस खुलासे पर हफ्ते-दर-हफ्ते, दिन-रात मेहनत करते हुए सबूत जुटाकर रपट तैयार की थी, यह पैसा अमरीकी कंपनी जे.पी. मोर्गन और रूजवेल्ट के साले की जेबों में गया था. इस खुलासे के बाद रूजवेल्ट ने पुलित्जर पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया और उन्हें सलाखों के पीछे धकेलने की धमकी दी. निचली अदालतों में तीन सालों तक चलते-चलते मामला अमरीकी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. अंत में, पुलित्जर की जीत हुई. यह उन पहले मामलों में से एक था, जब कोई पत्रकार देश के सबसे ताकतवर लोगों से भिड़ गया. उसके बाद के वर्षों में, पत्रकारों के हाथ कई सफलताएं लगीं, जैसे ‘वाटरगेट’ और ‘पेंटागन पेपर्स’ विवाद.

अब तक आप अपनी पत्रकारिता की कक्षाओं में इन मशहूर मामलों से परिचित हो चुके होंगे. जैसे-जैसे इस पेशे में आपका अनुभव बढ़ता जाएगा, आपको एहसास होगा कि पत्रकारिता का असल में एक सांस्कृतिक पहलू भी है. हर समाज में पत्रकारिता की ताकत में अंतर होता है. पुलित्जर, ‘वॉशिंगटन पोस्ट’, ‘न्यू योर्क टाइम्स’ ने संयुक्त राष्ट्र अमरीका में, जो दुनिया का सबसे पुराना और सबसे ताकतवर लोकतंत्र है, से टकराने की जुर्रत दिखाई. लेकिन कितने अखबारों ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारों और उनके काम का पक्ष लेते हुए, शक्तिशाली लोगों से टकराने की हिम्मत दिखाई है?

जवाब है: बिरले ही. हालांकि, पत्रकारिका की इस धूमिल छवि को बदला जा सकता है. और इसे बदलने का काम आप जैसे होनहार नौजवान पत्रकारों पर निर्भर करता है. बेशक, इस बदलाव के सिपहसलार बनने के लिए आप सभी को व्यक्तिगत स्तर पर मेहनत करनी होगी. मैं अपने इस व्याख्यान को मेहनत के उन्हीं क्षेत्रों पर केंद्रित करना चाहता हूं.

पत्रकारिता का हमारा पेशा हमसे असमान्य मेहनत की मांग करता है. इस पेशे में तमाम किस्म के मुद्दों पर गहरी समझ की दरकार होती है और साथ-साथ फौरन से पेशतर फैसले लेने की क्षमता. चूंकि पत्रकारों को समाज के ताकतवर तबकों के दबाव और रोष का भी लगभग सामना करना पड़ सकता है, इसलिए किसी खबर पर काम करने के सभी चरणों के दौरान आपमें ऐसी स्थितियों से निपटने का कौशल और रणनीति होना भी जरूरी है — कहानी के छपने से पहले और छपने के बाद भी. दुशवारियों से भरे इस पेशे में आपको स्व-रक्षा कवच भी विकसित करने होंगे. इन कवचों को जंग लगने से बचाने और कारगर बनाए रखने के लिए समय-समय पर उनकी साफ-सफाई और देखरेख भी जरूरी है.

निसंदेह, ताकतवरों को सच का आइना दिखाने से रोकने के लिए, लोग अपने आजमाए नुस्खों की मदद से आपको इस कवच से ही लैस नहीं होने देना चाहेंगे. एक संपादक किसी न्यूज स्टोरी के विचार को टेबल पर रखते ही उसका ‘कत्ल’ कर सकता है. एक अखबार का मालिक अपने न्यूजरूम में ‘वर्जित क्षेत्रों’ की सूची तय कर सकता है. यह सब बाहरी कारक हैं. लेकिन, पिछले कुछ समय से मैं बतौर संपादक होनहार पत्रकारों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए इन नकारात्मक ताकतों को पहले से ज्यादा चालाकी और धूर्तता से काम करते देख रहा हूं.

यह कैसे काम करता है? कोई भी पेशेवर ईमानदारी से यह दावा नहीं कर सकता कि उसे पत्रकारिता का पर्याप्त अनुभव हो गया है और कि उसे अब अपने जीवन में कुछ सीखने की दरकार नहीं. जबकि सीखने-सिखाने का सिलसिला ता-उम्र चलता रहता है. लेकिन हमारे देश में न्यूजरूम पर काबिज राजनीतिक और बौद्धिक रूप से रसूखदार लोगों या हमारे वरिष्ठ साथियों द्वारा नौजवान पत्रकार के विकास पर रोड़े अकटकाने और निष्क्रिय बनाने की कवायद अविराम चलती रहती है. इस काम को कदाचित बेहद मामूली उपलब्धियों पर तारीफ़ों के पुल बांधकर अंजाम दिया जाता है — जैसे, जब-तब उम्दा संपादक, उम्दा रिपोर्टर और उम्दा पत्रकार के तमग़े चस्पाँ करके.

किसी ध्यान आकर्षित करने वाला शीर्षक देने पर तारीफ़ें पाने के नशे में मैंने कई उप-संपादकों को आत्मतुष्ट होते और खरामा-खरामा जंग खाते देखा है. इस तरह की बेजा तारीफें किसी नौसिखिए पत्रकार के लिए, इस पेशे के अन्य पहलुओं को सीखने-समझने में अवरोध पैदा करती हैं. इस इकलौती प्रतिभा बल पर जब आप पर अन्य जिम्मेवरियां निभाने का समय आता है, तो आप उनके साथ न्याय नहीं कर पाते. कई बार तो खोजी पत्रकारिता के अत्यंत महत्वपूर्ण खुलासे ही इस नाकाबलियत के चलते ठंडे बक्से में डाल दिए जाते हैं, या, तथ्यों को इस कदर तोड़-मरोड़ पेश किया जाता है कि कहानी वैसे ही दम तोड़कर बे-असर हो जाती है. खोजी पत्रकारिता या उसकी अगुवाई करने में अनुभव की कमी होने के बावजूद भी, 

अगर आप केवल भाषा पर अपनी महारत की बदौलत इतराते घूमेंगे तो आपको कभी अपनी कमी या ख़ामी समझ नहीं आएगी.आज से पचास साल बाद पीछे मुड़कर देखने पर वर्तमान दौर के लिखे को पढ़ना ऐसा होगा मानो धो-पोंछकर पेश किए गए भारत को जान-समझने का प्रयास कर रहे हों.

इसी तरह से किसी रिपोर्टर की कोई स्टोरी जब सोशल मीडिया में छा जाती है, या, पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल रहती है तो वह रिपोर्टर अक्सर आत्म-संतुष्टि की चिर निद्रा में चली जाती/ जाता है. और अपने उसी इकलौते काम की रोटियां सेकने बैठ जाती/ जाता है, बनिस्पत एक के बाद असाधारण काम करना जारी रखने के.

जब न्यूजरूम्स में हर छोटी सी बात के लिए आपकी तारीफों के पुल बांधे जाने लगते हैं तो समझ लें यह आपको आत्म-संतुष्टि के जरिए सज़ा देने का तरीका है. जबकि वैसे तो प्रोत्साहित करना आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास पैदा करने के लिए अच्छी बात मानी जाती है.

लेकिन जब यही तारीफ सत्ता के दलालों की तरफ से आती है तो आपको उसे संदेह की नजर से देखना चाहिए. आपको समझना चाहिए कि वे भी आपके साथ संबंध बनाने की फिराक में रहते हैं. इसलिए उन्हें तरजीह ना दें क्योंकि ऐसा करने पर वे ही आपके लिए तय करने लगते हैं कि फलां स्टोरी कैसे लिखी जानी चाहिए या कि किस तरह की स्टोरी लिखने से बचा जाना चाहिए. धीरे-धीरे, उनकी अवांछित सलाहें आप पर हावी होने लगती हैं.

तो फिर इसका हल क्या है? बतौर एक होनहार नौजवान पत्रकार के रूप में आपको संतोष के भाव का शिकार होने से बचने के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि पत्रकारिता, जिसमें आपकी नैसर्गिक प्रतिभा है, उसे और अधिक तराशने-संवारने की दिशा में काम किया जा सके? आप अपनी आवाज कैसे विकसित कर सकते हैं, ताकि आपके काम को सार्थकता मिले? या कहें कि पेशे के वे कौन से पहलू हैं, जो आपके समग्र विकास में सहायक हो सकते हैं? किस तरह के कवच से आपको लैस होना चाहिए?

मेरा सुझाव है कि पत्रकारों को एक साथ पांच तत्वों पर काम करना चाहिए, ताकि वे विकार, अप्रासंगिकता और बेकार काम का शिकार ना बनें. यह पांच तत्व हैं: खबर को सूंघने की शक्ति, दुरुस्त मूल्यांकन, नैतिक साहस, विषय पर पकड़ और लिखने का कौशल. आपकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपने पूरे कार्य जीवनकाल में खुद को इन पांच तत्वों में निपुणता पाने के लिए किस हद तक धकेल सकते हैं.

चलिए, इन तत्वों पर एक-एक करके बात करते हैं:

पहला तत्व है, खबर सूंघने की शक्ति.

यह खबर को पहचानने की समझ है. क्या यह समझ किसी व्यक्ति में जन्मजात होती है? क्या पत्रकारिता की यह ख़ूबी किसी में जन्मजात होती है, या, उसे पत्रकार के रूप में तराशा भी जा सकता है?

कुछ प्रवृतियां, हुनर और यहां तक कि मूल्य — जैसे साहस — किसी-किसी में जन्म से ही दिखाई देने शुरू हो जाते हैं. बचपन के अनुभव और आदतें भी किसी की खबर पहचानने की समझ को घटा या बढ़ा सकते हैं. लेकिन प्रशिक्षण से इस हुनर को उबारा, या, पहले से मौजूद स्थिति में, तराशा जा सकता है.जिनमे खबर सूंघने की क्षमता शुरू में बिलकुल नहीं पाई जाती वे भी अभ्यास और प्रशिक्षण से इसे अपने भीतर विकसित कर सकते हैं.

खबर सूंघने की प्रवृत्ति के संबंध में  एक महत्वपूर्ण और पुराने सवाल पर ग़ौर करने की जरूरत है — पत्रकार कौन है?

क्या है? कोई बिजनेस प्रबंधक या प्रकाशक नहीं, ना मालिक. पत्रकार राज्यरूपी जहाज पर खड़ा एक पहरेदार है, जो समुद्र में दूर-दूर तक हर संभावित छोटे-बड़े खतरे पर नजर रखता है. वह लहरों में बह रहे उन डूबतों पर भी नजर रखता, जिन्हें बचाया जा सकता है. वह धुंध और तूफान के परे छिपे खतरों के बारे में भी आगाह करता है. उस अमय वह अपनी पगार या अपने मालिकों के मुनाफे के बारे में नहीं सोच रहा होता. वह वहां उन लोगों की सुरक्षा और भले के लिए होता है, जो उस पर भरोसा करते हैं.

खबर सूंघने की प्रवृत्ति, एक पत्रकार से हर छोटी से छोटी चीजों को दर्ज करवाती है. यह प्रवृत्ति समाज की भलाई और सुरक्षा-संबंधी किसी भी विषय से प्रज्ज्वलित हो सकती है. उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए कि इससे मालिक के हितों को नुकसान पहुंचता है या फायदा. एक सच्चा पत्रकार, व्यापक जनता की भलाई के सरोकारों से संचालित होता है.

एक पत्रकार होना कलाकार, चिंतक, लेखक या जन-हित में काम करने वाले वक़ील जैसा है. पत्रकार कोई कारोबारी, व्यापारी या राजनेता नहीं होता/ होती.

क्या खबरों को सूंघने की कला सिर्फ पत्रकारों में ही होती है? नहीं ऐसा नहीं है. यह कमोबेश लगभग सभी में पाई जाती है. एक मीडिया घराने के मालिक, जिसके लिए अपने निजी हित सर्वोपरि होते हैं, में अपने हिसाब से खबरों को सूंघने का शऊर पाया जाता है. तेल, टेलीकोम सीमेंट, खदान, साहूकार, रक्ष सौदों के दलाल, राजनेता, इत्यादि, भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में आज यही लोग मीडिया घरानों के मालिक बने बैठे हैं. यही वे लोग हैं जो अपने मुख्य धंधे की कमाई को मीडिया के धंधे में लगाते हैं, या कहें कि अपने मुख्य धंधे के मुनाफ़े में इज़ाफा करने के लिए मीडिया की ताकत को जरिया बनाते हैं.

ऐसी मंशा वाले इंसान से किसी भी प्रकार की सार्वजनिक भलाई की अपेक्षा नहीं की जा सकती. वह बस सार्वजनिक दायित्व निभाने का प्रपंच ही कर सकता है. असल में धंधा, वित्तीय हित और राजनीतिक भय और धंधे में इज़ाफा ही उसके प्रमुख सरोकार होते हैं. इसी कारण, जोसेफ पुलित्जर को प्रशिक्षित पेशेवर पत्रकारों से इतनी उम्मीदें थी. लेकिन कालांतर में वह अधिकांशत: गलत ही साबित हुआ.

1904 में, पुलित्जर ने लिखा कि सिद्धांतों पर टिके रहने की दृढ़ इच्छाशक्ति पेशेवर रूप से प्रशिक्षित पत्रकारों के पक्ष में जाती है, जिसका इस्तेमाल वह व्यापक जनहित में करेंगे. उन्होने आगे कहा:

यह बोध कि किसी भी सम्मानित पत्रकार को एक ऐसे अखबार का संपादक बनना कभी स्वीकार्य नहीं होगा, जो सार्वजनिक हितों की बनिस्पत निजी हितों को तरजीह देने वाला हो, इस तरह के उद्दयम को हतोत्साहित करने के लिए पर्याप्त है. जनता की नजर में अखबार की प्रतिष्ठा पर इस तरह का इनकार उतना ही घातक सिद्ध होता है, जितना अदालत में किसी नामी-गरामी वक़ील द्वारा केस के कागजातों को ख़ारिज करने पर.

लेकिन पुलित्जर एकदम गलत साबित हुए. हमारे देश में, हमारे इन तेलियों, टेलीकोम मालिकों, सीमेंट और खदान मालिकों, साहूकारों, रक्ष सौदों के दलालों, राजनेताओं ने सम्मानित पेशेवर पत्रकारों को निकाल-बाहर किया और उनकी पेशेवर आपत्तियों को पैरों तले रौंदा, लेकिन फिर भी उन्हें अपने अखबारों और चैनलों को चलाने के लिए उनके इशारों पर नाचने और उनके हितों की रक्षा करने वाले अपने मन-माफ़िक प्रशिक्षित पत्रकार मिल गए.

चूंकि अब हमें खासे अच्छे से मालूम चल गया है कि खबर सूंघने की क्षमता क्या होती है और इसे आज के दौर में कैसे बढ़ाया और कैसे इसकी तिज़ारत की जा सकती है, इसलिए हम अगले पहलू की तरफ बढ़ते हैं: दुरुस्त मूल्यांकन का शऊर. यह पहले और तीसरे के बीच की चीज है, यानी, खबर सूंघने या पहचानने की शक्ति और नैतिक साहस के बीच.

जब जोसेफ पुलित्जर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी को जर्नलिज्म स्कूल के रूप में एक बड़ा तोहफा दिया, उन्हें उस वक़्त बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा और उन पर सवालिया निशान खड़े किए गए. पत्रकार बनने के लिए किसी को पत्रकारिता क्यों पढ़नी चाहिए? पुलित्जर का मानना था कि खबर सूंघने की कला में दक्ष होने के अलावा पत्रकारिता पढ़ने से तीन फायदे होते हैं: दुरुस्त मूल्यांकन की क्षमता, नैतिक साहस और प्रशिक्षण एवं अनुभव. कोलंबिया जर्नलिज्म स्कूल स्थापित करते हुए उन्होंने यही तर्क दिया था. स्कूल स्थापित होने के लगभग सौ साल बाद मुझे भी उसी स्कूल से अपनी तालीम हासिल करने का गौरव प्राप्त हुआ.

पत्रकार द्वारा किसी खबर का सही-सही अवलोकन यह तय करता है कि स्टोरी क्या है और उसे अनिवार्य तौर पर कैसा होना चाहिए. यह तय हो जाने पर पत्रकार उस स्टोरी को तैयार करने में अपना सब कुछ दाव पर लगा देता है. यह अवलोकन वह पत्रकार व्यक्तिगत स्तर पर करता/ करती है, और, अगर न्यूजरूम में उसकी स्टोरी तथ्यों की जांच, संपादन तथा कानूनी कसौटियों पर खरी उतरती है तो उस पत्रकार को इस दुनिया में कोई भी ताकत अपने दायित्व को निभाने और अपने काम को अंजाम तक पहुंचाने से नहीं रोक सकती.

अतः उसके इसी अवलोकन, खबर पहचानने के इसी हुनर को पोसने की जरूरत है.

यह हमें नैतिक साहस की ओर भी ले जाता है. चाहे संपादक हो या संवाददाता, बिना नैतिक साहस के उसके पास कुछ नहीं है. जैसा कि कुछ विचारकों का मानना है कि सामाजिक परिस्थितियां और भौगोलिक स्थितियां भी व्यक्तियों में नैतिक साहस का निर्धारण करने में अपनी भूमिका निभाती हैं. इसलिए पत्रकारिता संस्कृतियों के हिसाब अलग-अलग होती हैं. कुछ देशों में, हर सत्तासीन व्यक्ति से सवाल पूछना पत्रकारिता में सही माना जाता है. 

कुछ अन्य देशों में, पत्रकारों को सत्तारूढ़ लोगों से सवाल पूछने की इजाजत नहीं है. कुछ और देशों में तो अभी तक चुनींदा निश्चित हितों को सवाल पूछने की छूट है, तो कुछ देशों में नहीं. यह अलग-अलग स्थितियां, उन देशों की राजनीतिक व्यवस्था का नतीजा हैं; और कि किसी जगह पर पत्रकार कितना नैतिक साहस दिखाते हैं.

हमें ऐसी दुनिया नहीं चाहिए जहां तख़्तनशीं से सवाल करने का अधिकार चंद संस्कृतियों तक सीमित रहे. यह कत्तई वांछनीय नहीं है कि किन्हीं देशों में तो आप सत्ता से सवाल कर सकते हैं, जबकि अन्यों में नहीं.

आइए देखते हैं पत्रकारिता के मानदंड स्थापित करने वाले इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का क्या मानना था, विभिन्न समाजों के सांस्कृतिक भेदों के बावजूद. इस संबंध में पुलित्जर मानते थे:

ज्ञान, खबर, अक्लमंदी से कहीं ऊपर, किसी अखबार की नैतिकता, उसका साहस, अखंडता एवं  मानवीयता, उत्पीड़ितों के प्रति उसकी संवेदनशीलता, स्वतंत्रता, जनहित को लेकर उसका समर्पण भाव और जन सेवा के प्रति उसकी चिन्ताओं में ही उसकी आत्मा का वास होता है.

ऊपर उद्धृत शब्द कितने प्रसांगिक जान पड़ते हैं.

आज के भारत में, शक्तिशाली पदों पर आसीन लोग पत्रकारिता को नैतिक साहस से विहीन कर देना चाहते हैं. मैं यहां किसी पार्टी-विशेष या विचारधारा की बात नहीं कर रहा हूं. ना ही समय-समय पर अपनी नाखुशी का इजहार करने वाले किसी पूंजीपति घराने या उनकी तरफदारी करने वाले ठेकेदारों की.को लेकर बेज़ा मशविरा देने की मंशा से कई बार फ़ोन किया. इन रपटों, जिनका ज़िक्र अभी ऊपर किया गया, का संबंध मीडिया, राजनीति और पूंजीपति घरानों से था. जाहिरा तौर पर, इनको लेकर इतना प्रतिरोध इसलिए भी था, क्योंकि इन्होंने जनता की नजर में खराब छवि वाले लोगों का पर्दाफाश किया था. उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि उनमें उठाए गए सवाल कितने प्रसांगिक थे, या, कि उनमें स्पष्ट तौर पर हितों के टकराव को उजागर किया गया था.

मेरी शिकायत देश के उन सबसे उदारवादी लोगों, जिनमे कई ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ भी शामिल हैं, से है जिन्होंने मुझे उन संवाददाताओं तक की स्टोरियों को लेकर, जिनको अंजाम तक लाने के लिए अदम्य नैतिक साहस की दरकार थी, 

आज के भारत में, विवेक और नैतिक साहस-विहीन पत्रकारिता से ही ये यथास्थितिवादी लोग खुश हैं. लेकिन आपको घुटने नहीं टेकने चाहिए. वर्षों से, दुनिया भर में इस विषय पर विचार करने वाले लोगों ने स्वीकारा है कि पत्रकारिता में नैतिक साहस और विवेक जगाना सबसे मुश्किल कामों में एक है. लेकिन, यह कत्तई असंभव काम नहीं है. जिस तरह सैन्य अकादमी या पड़ोस के मार्शलआर्ट स्कूल में विद्यार्थियों को शारीरिक साहस सिखाया जाता है, उसी तरह पत्रकारों में भी नैतिक साहस का संचार किया जा सा सकता है.

नैतिक साहस का विकास, पत्रकारिता सिखाने वाले स्कूलों, न्यूजरूम, देश-विदेश के पत्रकारों के संघर्षों के अध्ययन से भी विकसित किया जा सकता है. बतौर पत्रकार भले ही आप कमज़ोर कद-काठी के हों, जिसे कोई भी ऐरा-गैरा धकियाया सकता हो; भले ही आपको व्यापक समाज में कोई भी ना जानता हो और रसूखदार लोगों द्वारा परेशान करने पर वे आपके समर्थन में आवाज ना उठाएं; भले ही आप ऐसे वर्ग, जाति, लिंग या इलाक़ों से आते हों, जिनको भेदभाव का शिकार होना पड़ता है; भले ही बड़े शहर में आपकी कोई गिनती ना हो…लेकिन अगर आप में नैतिक साहस है,

तो आपको सबसे ताकतवर इंसान से टकराने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती. फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह देश का प्रधानमंत्री है या राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायधीश है या देश-दुनिया का सबसे अमीर आदमी. अगर आपकी कहानी में सच्चाई है और आपमें नैतिक साहस, तो दुनिया आपकी है.पिछले कुछ समय से मैं बतौर संपादक होनहार पत्रकारों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए इन नकारात्मक ताकतों को पहले से ज्यादा चालाकी और धूर्तता से काम करते देख रहा हूं.

आखिरकार, आपके पास सूचना की ताकत है. सत्य आपके साथ है. यह सही है कि ताकतवर लोग और उनके गुर्गे फिर भी आपकी उपेक्षा कर सकते हैं और आपको मानसिक रूप से विक्षिप्त करार दे सकते हैं. आपकी कहानी का बेशक तुरंत कोई प्रभाव होता ना दिखाई पड़े; दुनिया के धंधे बेशक पहले की तरह चलना जारी रहें, लेकिन आपने अपना काम कर दिखाया. यही आपकी उपलब्धि है. पत्रकारिता का सामाजिक दायित्व तब पूरा हो जाता है जब आप अपने काम के जरिए नैतिक साहस दिखाते हैं. बाक़ी सब समाज और उसके विवेक पर निर्भर करता है.

यह हमें पत्रकारिता के चौथे जरूरी स्तंभ की तरफ ले जाता है. किसी विषय पर अपनी पकड़ को  लगातार मजबूत करते रहने की जरूरत. पत्रकार परिभाषित रूप से ही हरफनमौला होते हैं और कुछ विषयों के उस्ताद. हम सभी को जहां तक संभव हो सके ज्यादा से ज्यादा विषयों में पारंगत होने की कोशिश करनी चाहिए. हमें अपने पूर्वग्रहों से भी उबरने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए. एक पत्रकार के लिए इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र, संस्कृति, अर्थशास्त्र और कानून के विषयों पर अपने ज्ञान में लगातार वृद्धि करते रहना जरूरी है. 

उसे किसी विषय का अनुसरण, सख्त दायरे में रहकर नहीं करना चाहिए. चूंकि आज के दौर में हम ज्ञान को इसी तरह खांचों में बांटते के आदी हो चुके हैं, इसलिए मैं यहां दो विषय चुन रहा हूं: समाजशास्त्र और इतिहास.

समाजशास्त्र, समाज में रहने वाले मानव जीवन का विज्ञान, एक पत्रकार के लिए सबसे उपयोगी विषय है. पश्चिम में, जैसे-जैसे यह विषय विकसित हुआ, शुरू में इसके अध्ययन का क्षेत्र सामाजिक वर्ग थे. फिर आई नस्ल, और कि, कैसे यह किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का निर्धारण करती थी. भारत में, समाजशास्त्र सबसे अप्रचलित विषयों में से एक है. यहां तक कि अकादमिक दुनिया के लोगों में भी यह विषय अपना कोई ख़ास स्थान नहीं बना पाया है. हमारे देश में अधिकांश समाजशास्त्री, इतिहास और राजनीतिक विज्ञान में अपने काम के लिए जाने जाते हैं, जो ऐसे विषय हैं जिनसे ज्यादा सार्वजनिक पहचान मिलती है और आसानी से प्रकाशकों से अनुबंध संभव हो जाते हैं. चूंकि इतिहास, मुख्यत:, दस्तावेज़ों पर आश्रित होता है और इसके लिए आपको लाइब्रेरी या आरकाईव के चक्कर लगाने पड़ते हैं. जबकि इसके उलट समाजशास्त्र फ़ील्डवर्क एवं आंकड़े एकत्रीकरण पर ज्यादा ज़ोर देता है. इस विषय की इसी उपेक्षा के कारण हमारे देश में समाजशास्त्र के क्षेत्र में मौलिक काम की भारी कमी पाई जाती है.

क्या यह महज अभिरुचियों और दिलचस्पियों का मामला है, या, यह व्यक्तियों को सक्रिय रूप से इस देश की सबसे घिनौनी सच्चाई, अर्थात जाति, से आमना-सामना ना करने देने की कोई कुत्सित साज़िश है? समाजशास्त्र के किसी भी सच्चे प्रेमी के लिए भारतीय समाज की प्रमुख छलनी, जाति, के सवाल को कुरेदने के लिए गहरे उतरने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए था, लेकिन अपनी उच्च जाति और सामाजिक ओहदे के चलते अकादमिक संसार के अधिकांश सुधिजन इस विषय से मूंह फेर लेते हैं. उनके बाक़ी के थियोरी-संबंधी काम को अगर कुछ देर के लिए अलह्दा रखकर भी देखें, तो भी उन्होने जाति पर मौलिक दस्तावेज नाममात्र के लिए ही ही ढूंढे हैं. इसका अर्थ हुआ कि जाति पर बहुत कम जमीनी और अकादमिक काम हुआ है. इसके मुकाबले, अमरीकी समाजशास्त्रियों ने नस्ल पर गहन काम किया है. चूंकि पत्रकार अक्सर किसी विषय को गहराई से समझने के लिए अकादमिक कामों पर नजर डालना चाहते हैं, परंतु वे जाति के सावल पर आते ही जैसे किसी अंधे कुंए में पहुंच जाते हैं. आदर्श तौर पर, किसी और विषय की बनिस्पत पत्रकारों को समाजशास्त्र का विषय, ज्ञान प्राप्ति का सबसे महत्वपूर्ण जरिया मानना चाहिए, क्योंकि पत्रकारों के मतलब के सबसे जरूरी विषय मानव समाज-संबंधी ही होते हैं. अगर आप समाज के एक बड़े पहलू की उपेक्षा करते हैं तो उससे पत्रकारिता दरिद्र होती है.

अब यहां मैं जिस दूसरे विषय पर बात करना चाहता हूं वह है: इतिहास.

इतिहास के साथ पत्रकार का संबंध पेचीदा होता है. एक पत्रकार को ऐतिहासिक तथ्यों और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से वाबस्ता होना चाहिए. उसे अपने काम की सत्यता और तथ्यपरकता का मूल्यांकन करने के लिए इतिहास के औजारों पर पकड़ बनाना जरूरी है, ताकि भविष्य के इतिहासकारों के लिए उसका काम इस्तेमाल योग्य बन सके.

विक्टोरिया काल के इतिहासकार जॉन सीली ने कहा था, “इतिहास, अतीत की राजनीति है; और वर्तमान राजनीति भविष्य का इतिहास.” अगर उनकी बात सही है तो, पत्रकार अपने लेखन के जरिए आने वाली पीढ़ी के लिए इतिहास लिख रहे होते हैं; और वर्तमान की राजनीति दर्ज करना, रोजनामचे लिखने जैसा है. इससे जो मुख्य सवाल उठता है कि पत्रकार आज जो दर्ज कर रहे हैं वह कितना तथ्यात्मक है. क्या आज के पत्रकार अपने समय का हर संभव विस्तृत ख़ाका तैयार कर रहे हैं? या कि वे महज हमारी दैनिक राजनीति के सरकारी तंत्र के जन-संपर्क वक्तव्यों को ही दर्ज करने में लगे हैं? क्या ये कटे-कटाए, धोए-सुखाए विवरण, भविष्य में इतिहास के रूप में दर्ज होंगे?

आजकल एक घाघ संपादक किसी न्यूज स्टोरी को सीधे एक बार में नहीं मारता. वह पहले उसे टालता रहता है और छपने नहीं देता. इस तरह धीरे-धीरे रिपोर्टर के कम्यूटर के फोल्डर में अप्रकाशित खबरों का अंबार बढ़ने लगता है.



पिछले छह-सात सालों में मोदी ने, देश की सभी संवैधानिक-गैर संवैधानिक संस्थाओं पर बुलडोजर फेर दिया है. वर्तमान समय को दर्ज करने में, पत्रकारों की भूमिका विशेषकर बेहद शोचनीय रही है. जब भी राजनीतिक आकाओं ने अपनी अप्रसन्नता जाहिर की, मीडिया घरानों के मालिक उनके सामने शाष्टांग प्रणाम की मुद्रा में आ गए. आत्मसम्मान-विहीन संपादकों ने सत्ता के आगे घुटने टेक दिए और संवाददाताओं द्वारा फाइल की गई महत्वपूर्ण खुलासों को कुचल डाला. आजकल एक घाघ संपादक किसी न्यूज स्टोरी को सीधे एक बार में नहीं मारता. 

वह पहले उसे टालता रहता है और छपने नहीं देता. इस तरह धीरे-धीरे रिपोर्टर के कम्यूटर के फोल्डर में अप्रकाशित खबरों का अंबार बढ़ने लगता है. कई संवाददाता बिना अपना बेहतरीन काम प्रकाशित करवाए ही यूं ही चलते रहते हैं. उन्हें ऐतिहासिक चेतना के बगैर काम को करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. जबकि अगर इस चेतना के साथ उनसे काम करवाया जाता तो उनके काम को टिकाऊ और प्रासांगिक बनाया जा सकता था.

यही वजह है कि आप गौ-गुंडागर्दी, शराबखानों पर हमलों, सिरफिरे नेताओं द्वारा बे-सिरपैर के बयानों पर तो बहुत से लेख देखते हैं, लेकिन इन लेखों से सत्ता में बैठे लोगों के बालों पर सुई तक नहीं रेंगती. कुर्सी हिलना तो दूर की कौड़ी है.

किन्हीं चुनींदा मामलों में, कभी कभार शक्तिशाली कंपनी को भी ज़ोर-शोर से निशाना बनाया जाता है. लेकिन ऐसा इसलिए संभव होता है क्योंकि कुछ बड़े रसूख वाले लोग मिलकर अपने निहित स्वार्थ के लिए किसी को सबक सिखाना चाह रहे होते हैं. लेकिन बात जब सबसे ऊंचे स्तर पर होने वाले अपराधों और संगठित लूट की आती है, तो पत्रकार प्रायः सच्चाई के करीब भी नहीं फटकना चाहते.

आज से पचास साल बाद पीछे मुड़कर देखने पर वर्तमान दौर के लिखे को पढ़ना ऐसा होगा मानो धो-पोंछकर पेश किए गए भारत को जान-समझने का प्रयास कर रहे हों. जब हम आज की जाने वाली पत्रकारिता पर नजर डालेंगे, तो हमें हमारे देश के इन सात प्रमुख स्तंभों के बारे में लगभग कुछ नहीं मिलेगा: प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, वित्त मंत्रालय, और वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी अध्यक्ष. इसके बाद आते हैं:

रिलायंस और अदानी ग्रुप, दो बड़े पूंजीपति घराने, जो मोदी काल में खूब फले फूले; और अंत में: सालाना तीन लाख करोड़ बजट वाला, रक्षा मंत्रालय. इस मंत्रालय का बजट दुनिया भर में सबसे अधिक बजट है और इसकी दिलचस्पी उपमहाद्वीप में तनाव बनाए रखना है. परंतु, पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों के विपरीत, इन अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर लगभग चुप्पी छाई रहती है. बेशक, आप इनमे कई और विषय और क्षेत्र जोड़ सकते हैं, जिन पर लगभग किसी क़िस्म की विवेचनात्मक जांच नहीं मिलती. राज्य स्तरों पर इन बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के अपने क्षेत्रीय मुद्दे हैं. लेकिन मेरा कहना है कि अगर पत्रकार की प्रमुख ज़िम्मेवारी समकालीन राजनीति, नीतियों और फैसलों पर लिखना है, तो पत्रकार अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक प्रकार से नहीं कर रहे हैं. उस अर्थ में बड़े-बड़े अखबारों और टीवी कंपनियों में काम करने वाले हजारों पत्रकारों से असल पत्रकारिता का काम नहीं लिया जा रहा. उनके द्वारा किए गए काम का कोई अभिलेखीय मूल्य नहीं है.

राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, कानून जैसे ना जाने कितने विषय हैं और एक पत्रकार के लिए अपने क्षितिज को विस्तार देना जिंदगी भर चलने वाला उद्दयम है. अपने पेशेवर जीवन में आगे बढ़ते हुए वे इन तमाम विषयों पर बेहतरीन काम करके दिखा सकते हैं. निस्सन्देह इनमे हर विषय पर ढेरों टन पाठ्य सामग्री मौजूद है और इन्हें एक जीवन में पढ़ पाना असंभव. यह विनम्र करने वाला एहसास है कि जानने- सीखने को कितना कुछ मौजूद है.

यह हमें हमारे अंतिम बिंदु पर ले आता है: शिल्प, कौशल या कारीगरी.

पत्रकारिता से जुड़ी हर चीज कौशल, शिल्प या कारीगरी की श्रेणी में आती है. जिस भाषा का इस्तेमाल आप करते हैं. लेखन की विधा के साथ जुड़ा सौंदर्य, प्रस्तुति, विन्यास, किरदार और तस्वीरों का आकर्षण, सभी मल्टीमीडिया माध्यम में मायने रखते हैं.

अधिकांश पत्रकार शिल्प के विचार को केवल भाषा से जोड़कर देखते हैं. यह सही है कि आपकी भाषा और गद्य जरूरी अवयव हैं. जिस तरह आप अपने किरदारों में जान फूंकते हैं वह आपके लिखे को यादगार बनाता है. लेकिन इस हुनर को केवल भाषा तक सीमित रखना, पत्रकारिता के ‘क्राफ्ट’ को ‘मिसरीड’ करना है. ‘सब-दुखों-की-एक-दवा वाला’ नुस्खा नुकसानदायक साबित हो सकता है, खासकर तब, जब भिन्न प्रकार के लेखन की शैली अलग-अलग हो.

मिसाल के तौर पर खबर लिखते हुए आप पाठक के संयम की परीक्षा नहीं ले सकते. सर के बल खड़े पिरामिड का जांचा-परखा तरीका आज भी उतना ही कारगर माना जाता है. खबर लिखने को, मत-लेखन में तब्दील नहीं किया जा सकता. एक खोजी पत्रकार अपने लेखन में शायद अपने खुलासे का एक छोटा सा हिस्सा प्रयोग में लाए. जो हिस्सा प्रयोग में ना लाया जा सका हो, वह संभव है उसकी नोटबुक में दर्ज रहे. 

‘मामले’ के तहखाने तक जाने के के रास्ते के रूप में. जिसे वह अभी दुनिया के सामने, इसलिए उजागर नहीं करना चाहता/ चाहती कि कहीं उसके लिए तहखाने के दरवाजे सदा के लिए बंद ना कर दिए जाएं. फीचर लिखते हुए एकत्रित जानकारी को विस्तार से बताने के लिए अपने देखे-सुने को मिर्च-मसालों के साथ पेश किया जा सकता है. लेकिन अगर खोजी पत्रकारिता की रपट लिखते वक़्त उस शैली को अपनाया जाता है तो बात बिगड़ सकती है, जिससे पत्रकार की कहानी का अपने मूल उद्देश्य से भटकने का खतरा बाढ़ जाता है.

इस तरह हम देखते हैं कि एक प्रकार की पत्रकारिता से दूसरे प्रकार की पत्रकारिता के शिल्प में बदलाव आता रहता है. ठीक उसी तरह जिस प्रकार सार्डीन मछली और शार्क मछली को पकड़ने की तकनीक और साजो-सामान एक दूसरे से अलग होते हैं. एक बढ़ई भी अलग-अलग फर्नीचर बनाने के लिए अलग-अलग औज़ारों और लकड़ी का इस्तेमाल करता है. अक्सर अलग-अलग किस्म के कामों के लिए विभिन्न किस्म के हुनर की आवश्यकता पड़ती है. लेकिन अभ्यास और अनुभव से, पत्रकारिता की कला के विभिन्न पहलुओं में महारत हासिल की जा सकती है.

ऊपर उद्धृत पांच बिंदुओं को बताने का मेरा आशय यह नहीं है कि आपके सामने करने को कोई भारी भरकम काम आन पड़ा है. इसे एक साधारण अनुकूलन की दृष्टि से समझें, जिसे मैं आपको बताना चाहता था. सीखने-सिखाने का सिलसिला अभी खत्म नहीं, बल्कि शुरू हुआ है. और यह एक अच्छी बात है. जिस क्षण आपको पत्रकारिता में मज़ा आने लगेगा और लगेगा कि इस पेशे से आपके जीवन को मायने मिलते हैं, तो ऊपर बताई गई चुनौतियाँ आपको भारी-भरकम नहीं लगेंगी. ठीक वैसे ही जैसे किसी खानसामे के लिए खाना बनाना, क्रिकेट खिलाड़ी के लिए क्रिकेट खेलना, या नृतक के लिए नृत्य उतने मुश्किल और बोझिल नहीं लगते. इन पांचों पहलुओं में आपका अध्ययन और इस प्रक्रिया में अपने साथियों को साथ लेकर चलना, पत्रकारिता के इस खेल का उसी तरह अभिन्न हिस्सा है, जैसे क्रिकेट के मैदान में फ़ील्डर का बॉल के पीछे दौड़ना, या, बतौर बेट्समैन रिवर्स स्विंग खेलने का अभ्यास करना.

इन पांच पहलुओं को रेखांकित करते हुए मैंने कोशिश की है कि मैं इस पेशे के मानदंडों की सही-सही तस्वीर आपके सामने रखूं. पुलित्जर और उनके जैसे शुभचिंतकों द्वारा कल्पित संसार के विपरीत, आज की पत्रकारिता निजी हितों की जकड़ में है, जो अपने हित साधने में लगी है. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इस पवित्र पेशे की साख दाव पर लगी है; और उसे दाव पर लगाने वाले कोई और नहीं बल्कि मीडिया मालिक खुद हैं.

अब चूंकि आप मीडिया के विशाल सागर में डुबकी लगाने वाले हैं, तो जाहिरा तौर पर आपको अपने चारों तरफ बहुत कीचड़ नजर आएगा. इस कीचड़ के बीच खड़े होकर खुद को दाग से बचाना मशक्कत का काम है. यानि अपने औज़ारों की मदद से दाग़ साफ करते रहने का काम लगातार करते रहना पड़ेगा. जितने लंबे समय तक आप यह काम करते रहेंगे, उतना ही आप इसमें दक्षता हासिल करते जाएंगे. इसमें सिर्फ हुनर से काम नहीं चलेगा, बल्कि शातिरता और संयम की भी जरूरत पड़ेगी.

आज के भारत में, जैसा में पहले भी बता चुका हूं, पत्रकारिता जगत में आपके अधिकांश मालिक तेली, सीमेंट कारखानों, खदानों के मालिक, साहूकार, रक्षा सौदों के दलाल, जमीने खरीदने-बेचने वाले या राजनेता होंगे. आपको उन्हीं के यहां अपनी ट्रेनिंग और नौकरियां करनी पड़ेंगी. बदकिस्मती से, मुख्यधारा की पत्रकारिता की यही नंगी सच्चाई है.

इसके बावजूद, आप कीचड़ में भी पैर जमाकर डटे रहें और अपनी दृष्टि साफ रखें. यह पत्रकार के जीवन का अभिन्न हिस्सा है. इस सफर में टकराव और मतभेद होंगे, लेकिन आप उनका दृढ़ता से मुकाबला करें. इसलिए, किसी भी मीडिया घराने से आने वाली नौकरी को बेहिचक स्वीकार करें.

नौकरी पाने के बाद आपको क्या करना है?

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अखबार या चैनल का मालिक कौन है. इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुख्य संपादक या मालिक ने सत्ताधारियों से किस हद तक समझौता कर रखा है. एक नौजवान रिपोर्टर के नाते आपके पास ऊपर बताए गए पांचों क्षेत्रों में आगे बढ़ने कई रास्ते होंगे. पहला क्षेत्र, यानि, खबर सूंघने की प्रवृत्ति; और आखिरी दो, यानि, विषय पर पकड़ और लेखन शैली को सुधारने का मौका होगा. आपका मकसद होना चाहिए अपनी लिखी या बयान की गई हर रिपोर्ट से अपने काम में बेहतर होते जाने की लगातार कोशिश करते जाना. खासकर इन तीन क्षेत्रों में.

हालांकि, आज के भारत के न्यूज रूम में फैसले लेने और नैतिक साहस दिखाने से टकराव उत्पन्न होने की संभावना है. यहां आपको बुद्धिमत्ता से काम लेना पड़ेगा. आपको भांपना होगा कि कब शेरनियों की तरह दहाड़ना है और कब सांप की तरह समझदारी दिखाते हुए घात लगाकर बैठ जाना है. आपको बॉस के समक्ष उसकी राय से अलग अपनी बात को प्यार-मोहब्बत से प्रेषित करने की कला सीखना जरूरी है. करियर के शुरुआत में हर छोटी बात पर झगड़ने में होशियारी नहीं है, बल्कि आपकी कोशिश होनी चाहिए कि बॉस के निर्णय से अपनी ना-इत्तेफाकी बुद्धिमतमत्तापूर्ण दलील से जाहिर की जाए. अपनी बात को रखते हुए गाय की मासूमियत इख्तियार कर लें. आप अपने इस व्यवहार से विस्मित हो सकते हैं, लेकिन कम्युनीकेशन स्टडीज में बताया जाता है कि यही रणनीति आखिर में कारगर साबित होती है.

कई बार एक के बाद एक स्टोरी कुचलने वाले संपादक भी एक हद के बाद अपना दिमाग़ खोलना शुरू कर देते हैं. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ऐसा हमेशा होता है. लेकिन करियर की शुरुआत में अपने सराहनीय काम को लेकर अपने मत पर कायम रहते हुए भी आपका झगड़ालू ना होना, लंबे अंतराल में आपके हक में जा सकता है. अपने संपादक को चुनौती देते समय अपने द्वारा किए गए काम की खासियतों तक ही सीमित रहें.

पंडिताई दिखाने और शब्दाडंबर गढ़ने के फेर में पड़ने से बचें. लेकिन हर कहानी, हर काम, हर टिकर, हर ट्वीट, हर शीर्षक, हर हैशटैग पर आप बा-इज्जत असहमत रहते हुए अपने विचार रख सकते हैं.

अगर आप अपने काम में, पहले और आखिरी दो बिंदुओं में उस्ताद हैं, तो अपने बॉस से जब-तब उलझने वाले की छवि के बावजूद भी, दफ्तर में आपकी जरूरत महसूस की जाती रहेगी. वे आपको जाने नहीं देंगे. इसका अर्थ यह हुआ कि आप अपने काम में कोताही बरतना गवारा नहीं कर सकते. इसलिए उत्कृष्ट होने के लिए प्रयत्न करें. अपने काम में इतने उत्कृष्ट बनें कि उन्हें आपकी जरूरत हमेशा महसूस होती रहे.

और यह आपको बीच के दो बिंदुओं में वैधता प्रदान करेगा. अंतत: कुछ सफलता आपके कदम चूमेगी.

यह सफलता पहले से बेहतर किसी अन्य मीडिया संस्थान में नई नौकरी और नई जिम्मेदारी के रूप में भी आ सकती है. ऐसा नहीं है कि नई जगह पर मुश्किलें नहीं मिलेंगी, परंतु शायद पहले से कम. इसलिए वहां भी आपको वही करना है, जो पिछली नौकरी में कर रहे थे. क्योंकि अगर आप खबर सूंघने और विषय पर अपनी पकड़ बनाए रखने के मामले में भरोसेमंद मीडियाकर्मी हैं तो वे आपको आसानी से नहीं जाने देंगे.

मैं जानता हूं कि संघर्ष का यह दौर किसी के लिए भी आसान नहीं होता. लेकिन मैदान में हर मुश्किलातों के बावजूद डटे रहें, ख़ासकर शुरुआती सालों में.

इसी रास्ते एक दिन आप अपने सपनों का न्यूजरूम पा सकते हैं, या, अपना न्यूजरूम बना सकते हैं. यह तमाम लड़ाइयां पत्रकार होने का हिस्सा है. याद रहे कि आपकी लड़ाई झूठ और अन्याय के खिलाफ है और झूठ और अन्याय को बढ़ावा देने वाली ताकतें बलवान हैं. ऐसे अनैतिक हाथों में मीडिया की लगाम देना खतरनाक है.

लेकिन जो बात उम्मीद की किरण जगाने वाली है कि सत्य और न्याय के साथ खड़ी होने वाली ताकतें उनसे भी बलवान हैं.

सत्य और न्याय के लिए आवाज उठाना आज के भारत में बहुत से लोगों को बेहद नैतिकता भरा काम लगता है. वह इसलिए क्योंकि दिक्कत उन्हीं के साथ है. इसकी वजह या तो उनका संदेहास्पद अतीत होता है, या, ताकतवर हितों की दलाली और रसूखदारों से रिश्ते बनाए रखने की मजबूरी या समाज में अपनी बनी बनाई साख से अपदस्थ हो जाने की फिक्र. लेकिन आपको इस पेशे के बुनियादी सिद्धांतों को रखने वाले लोगों भर भरोसा होना चाहिए, जिन्होंने पत्रकारिता को धारदार, तथ्यात्मक और सशक्त बनाया. उनकी मंशा हमें सत्तारूढ़ों को जवाबदेह बनाने की थी. ना सिर्फ राजनीतिक सत्ता को, बल्कि हर प्रकार के शक्तिशाली लोगों को. अगर आपके काम से लोगों में असहजता का भाव उत्पन्न होता है, तो समझिए कि आपके काम का असर हुआ है. इस पेशे में लोग आपको हैरान-परेशान करते रहेंगे. एक पुरानी कहावत है: लोगों की बजाय सिद्धांतों को अपना आदर्श बनाएं.

नतीजतन, आज के भारत में अगर आप पत्रकार हैं तो बहुत मुमकिन है कि अन्य पेशों की बनिस्पत आपके दोस्तों की संख्या बहुत सीमित रह जाएगी. जब मैं उन्नीस साल पहले दिल्ली आया या कहें कि जब मैंने 11 साल पहले ‘कारवां’ से अपनी शुरुआत की तो उस समय दिल्ली में मेरे अनेक मित्र थे. लेकिन दिल्ली में रहते हुए बतौर एक पत्रकार आप एक साथ एक ही चीज के साथ न्याय कर सकते हैं. आपको अपने पेशे और अपनी दोस्तियों में से किसी एक को चुनना होता है. मेरी इन दोस्तियों को कुछ बड़ी कहानियां खा गयीं, कुछ को पुस्तक समीक्षाएं.रिश्ते कभी भी एक समान नहीं रहते और अगर सिद्धांतों के पीछे कुछ दोस्तियों को न्योछावर करना भी पड़ जाए तो चलता है. अगर बाईलाइन के साथ लिखने वाले संवाददाता की हर कहानी को बारीकी से जांचा-परखा जाने लगेगा, तो एक संपादक को हर छपने वाली कहानी के साथ अपने दोस्तों को खोने के लिए तैयार रहना पड़ेगा. भले ही अपने संवाददाता के लिखे से हर बार आपकी सहमति ना भी हो.

लेकिन कुछ मित्रताएं लेन-देन संबंधी हो सकती हैं और छपी हुई रिपोर्ट पर होने वाली प्रतिक्रिया को संबंधित व्यक्ति की वफादारी की परीक्षा के रूप में लिया जा सकता है. एक संपादक सिर्फ इसलिए किसी खबर को दबा नहीं सकता क्योंकि उसका दोस्त उसे दबाना चाहता है.

इसलिए पत्रकारों के लिए यही बेहतर रहता है कि वे शक्ति केन्द्रों और सामाजिक असर रखने वाले लोगों के दायरों के बाहर ही अपनी दोस्तियाँ बनाएं. जितने असंकीर्ण और खुले विचारों वाले लोगों से आप दोस्तियां गाठेंगे, 

उतनी ही नई बातें सीखने को मिलेंगीं. यह बहुत दुःख की बात कि मैंने बहुत कम पत्रकारों को अपने पेशे और सामाजिक दायरे के बाहर दोस्तियाँ बनाते देखा है. मेरा आशय यहां आपको डराना नहीं है. लेकिन, बतौर पत्रकार अपने पेशे के इस पहलू को समझना भी आवश्यक है.

कुछ लोगों को लगता है कि एक संपादक बहुत शक्तिशाली होता है. लेकिन सिद्धांतों पर चलने वाले एक न्यूजरूम में, संपादक उतना शक्तिशाली नहीं होता, जितना लोगों को दिखाई देता है.

अंग्रेज़ी राजनीतिक व्यंगात्मक धारावाहिक ‘यस, प्राइम मिनिस्टर’ में इस बात को सही-सही पकड़ा है.

धारावाहिक में, ग्रेट ब्रिटेन के काल्पनिक प्रधानमंत्री जिम हेकर एक अखबार में शासकीय गोपनीयता की खबर को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं. एक सीन में वह अखबार के संपादक, डेरिक बर्नहेम को अपनी मेहमाननवाजी से बर्गलाने के लिए दिन के भोज का निमंत्रण भेजते हैं. शुरू में, बातचीत अनर्गल बातों के इर्दगिर्द गोल-गोल घूमती रहती है. इस बातचीत में, संपादक कुछ खास नहीं उगल रहा, जिसके कारण प्रधानमंत्री की खीज बढ़ने लगती है. थक-हारकर वे संपादक से सीधे सवाल करते हैं.

“मैं चाहता हूं कि आप उस स्टोरी को वापिस ले लें,” हेकर कहते हैं.

बर्नहेम जवाब देते हैं, “मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा कुछ कर सकता हूं.”

“आप ऐसा बिलकुल कर सकते हैं,” हेकर कहते हैं. “आखिर आप संपादक हैं, नहीं हैं क्या?”

“हां हूं, लेकिन संपादक सेना के किसी कमांडर की तरह नहीं होता,” बर्नहेम प्रधानमंत्री को बताते हैं. “बल्कि वह सर्कस में किसी रिंगमास्टर की तरह होता है. मेरे कहने का मतलब है मैं काम निर्धारित कर सकता हूं, लेकिन मैं कलाबाजों को यह नहीं बता सकता कि उन्हें किस दिशा में कूदना है.”

एक संपादक अपने ही संस्थान में अपने मेरिट पर आने वाली खबर के सामने एकदम लाचार भी हो सकता है.

संपादक के दायित्व को देखने का अन्य तरीका है कि उसकी साख अपने ही साथ काम करने वाले लोगों के समक्ष हमेशा दाव पर लगी होती है. 2009 में, न्यू योर्क में जब मैंने अपने एक प्रिय मित्र को बताया कि मैं एक पत्रिका में काम करने के लिए भारत लौट रहा हूं, तो उसकी मेरे लिए सिर्फ एक सलाह थी: “हरामी कहलाने के लिए कमर कस लेना,” उसने कहा. क्योंकि संपादक को ऐसे फैसले लेने होते हैं जिनका संबंध कार्यपद्धति, संपादकीय मानदंड और प्रशासनिक निर्णयों से होता है. एक संपादक को न्यूजरूम में अक्सर बुरे इंसान के रूप में देखा जाता है. संपादक अपने अधीन काम कर रहे कर्मियों को डेडलाइन पर कायम रहने के लिए हर समय प्रताड़ित करता रहता है. इस झमेले में, कभी-कभी वह खुद अपनी डेडलाइन पर कायम नहीं रह पाता. उसे रिपोर्टर को और मेहनत करने, फील्ड में दुबारा जाने, स्त्रोत के पास बार बार वापिस लौटने और यहां तक कि कभी-कभी फ्लाइट पकड़ने या डेडलाइन पर कायम रहने के लिए लोगों को आधी रात में भी जगाना पड़ता है. एक संपादक को मालिक के सामने भी तलब होना पड़ता है, जब मालिक किसी खास खबर की गति पर लगाम लगाना, या, रिपोर्टर के यात्रा खर्च में कटौती करना चाहता है, जिससे उसकी पत्रकारिता की उत्कृष्टता पर असर पड़ सकता है. लेकिन अधिकांशत: डेस्क पर काम करने वाले उप संपादक और संवाददाता ही उसके दुश्मन बन जाते हैं. कईयों की नजर में संपादक हैरान-परेशान करने वाला, क्रूर दरिंदा, बेगारी करवाने वाला हरामी होता है. इसलिए एक संपादक को इसी तमगे के साथ अपनी चिता या कब्र में जाने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.

संवाददाताओं की अपनी खुंदकें होती हैं. संवाददाता एक ऐसा जीव है, जिसे अपने व्यावसायिक जीवन में कदम-कदम पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. एक संवाददाता को उसके ही संभावित स्त्रोत द्वारा सार्वजनिक खिल्ली या शारीरिक हमले की धमकी का सामना करना पड़ सकता है. उसे किसी दफ्तर से धक्के मार कर निकाला जा सकता है. मैंने एक बार किसी साहूकार मालिक के अखबार के एक वरिष्ठ संपादक को कहते सुना कि उसे रिपोर्टिंग करना इसलिए पसंद नहीं क्योंकि उसे लोगों को फोन करना नहीं भाता.

उसे नोट्स लेना भी पसंद नहीं था. वह एक उच्च जाति के अभिजात परिवार से संबंध रखता था.

चुनांचे मेरा यह विश्वास बढ़ता ही जा रहा है कि अभिजात वर्ग के लोगों को अगर पत्रकारिता के पेशे में अच्छा करना है तो उन्हें संजीदगी से इस पेशे में खुद को डुबोने और अपना खून-पसीना एक करने की आवश्यकता है. उन्हें स्त्रोत द्वारा बाहर का रास्ता दिखाए जाने, बेइज्जती सहने या उससे भी बुरे बर्ताव के लिए सदैव तैयार रहना पड़ेगा. 

और इस मामले में अभिजात वर्ग के बाहर से आने वाले लोगों के उतने नाज-नखरे नहीं होते. अभिजात वर्ग के नौजवानों को अच्छा रिपोर्टर बनने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी.

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