कोरोना काल में पत्रकार जान बचाएं या नौकरी?

भारत में पत्रकार लगातार कोरोना का शिकार हो रहे हैं. खतरा सिर्फ वायरस तक सीमित नहीं है. पुलिस के डंडे, मुकदमे और नौकरी जाने का डर भी है. ऐसे में मीडिया संस्थान क्या अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?

भारत में कोरोना महामारी थमने का नाम नहीं ले रही है. इसका ग्राफ लगातार ऊपर ही जा रहा है. कुल मरीजों की संख्या को लेकर भले ही भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर हो लेकिन हर रोज सबसे अधिक मामले यहीं ही आ रहे हैं. मंगलवार को एक दिन में भारत में कुल 78,000 मामले आए और 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई. पूरे देश में अब तक करीब 38 लाख कोरोना के मामले रिकॉर्ड हो चुके हैं और 8 लाख एक्टिव केस हैं.

इस बीच, पत्रकारों पर भी कोरोना की चोट हो रही है. पिछले दो दिनों में कम से कम दो पत्रकारों की कोरोना से मौत हो गई. पहले मंगलवार को इंडिया टुडे ग्रुप के नीलांशु शुक्ला की मौत की खबर आई और फिर बुधवार को समाचार एजेंसी पीटीआई के एक पत्रकार अमृत मोहन का निधन हो गया. ये दोनों ही पत्रकार लखनऊ में कार्यरत थे. फिर पुणे में टीवी – 9 मराठी के पत्रकार पांडुरंग रायकर की कोरोना से मौत हो गई. इससे पहले भी कोरोना से पत्रकारों की मौत की खबर आती रही हैं. जून में एक तेलगू टीवी चैनल के एक पत्रकार की मौत हो गई थी. इसके अलावा कई पत्रकारों के लगातार कोरोना पॉजिटिव होने की खबर आ रही है.

पत्रकारों के लिए चुनौती

कोरोना महामारी के साथ ही पत्रकारिता का तरीका बदल गया. पत्रकारों की सीमाएं तय हो गई. ब्रॉडकास्ट (टीवी) या वीडियो जर्नलिज्म कर रहे पत्रकारों के लिए व्यावहारिक कठिनाई थोड़ा अधिक थी. भीड़ में जाना, लोगों से मिलना और बात करना. सामाजिक दूरी बनाते हुए पत्रकारों के लिए रिपोर्टिंग आसान नहीं थी. एनडीटीवी इंडिया के पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला ने लॉकडाउन की शुरुआत से दिल्ली से लेकर यूपी और बिहार में कई दिनों तक रिपोर्टिंग की. कई बार उन्हें कैमरामैन मयस्सर होता तो कई बार वह अकेले सेल्फी स्टिक और मोबाइल से जर्नलिज्म कर रहे थे.

शुक्ला कहते हैं कि कोविड संक्रमण से बचना हर वक्त उनके हाथ में नहीं था. उन्होंने डीडब्ल्यू हिन्दी को बताया, “सामाजिक दूरी बनाना इसलिए मुश्किल था क्योंकि यह एकतरफा कोशिश से नहीं हो सकता. मिसाल के तौर पर प्रवासी मजदूरों की समस्या का ही मामला लीजिए. सड़क पर भटक रहे मजदूरों को संक्रमण का डर नहीं था बल्कि उनमें अपनी समस्या को बताने की उत्कंठा कहीं अधिक थी. तमाम एहतियात के बाद मुझे हमेशा यह एहसास रहा कि फिजिकल डिस्टेंसिग का नियम टूट रहा है. हम दो या तीन लोगों की टीम में काम कर रहे थे और हममें से हर किसी ने पूरे दिन सामाजिक दूरी के नियमों का पालन किया है यह कहना मुश्किल था. इसलिए मैंने पिछले 4-5 महीनों में रिपोर्टिंग दो बार अपना कोविड टेस्ट कराया.”

वॉयस ऑफ अमेरिका की पत्रकार रितुल जोशी भी शुक्ला की बात से सहमत हैं. रितुल दिल्ली के अलग अलग इलाकों से मजदूरों की समस्या पर की गई रिपोर्ट को याद करते हुए कहती हैं, “कैमरा ऑन होते ही हर तरफ से मजदूर घेर लेते थे. उनकी कहानियां इतनी दर्दनाक होती थीं और आधे लोग बोलते बोलते रो पड़ते थे. ऐसे में उनसे यह कह पाना कि, भैया तीन फीट की दूरी रखिए, कम से कम मेरे लिए तो मुमकिन नहीं था. नोएडा की जिस झुग्गी बस्ती में मैं गई वहां एक भी आदमी के मुंह पर मास्क नहीं था. लेकिन आधे से ज्यादा लोगों के बदन पर कपड़े भी पूरे नहीं थे. उनसे मास्क, साबुन और सैनिटाइजर की बात करना भी किसी भद्दे मजाक जैसा था.”

संस्थानों ने इस दौरान “वर्क फ्रॉम होम” को ही बढ़ावा दिया. जो रिपोर्टर, कैमरामैन या फोटोग्राफर फील्ड में थे उन्हें ऑफिस न आने को कहा जा रहा था. शिफ्ट की कड़ी पाबंदी के साथ दफ्तर में काम कर रहे लोगों के बीच आइसोलेशन बनाया गया. यानी दफ्तर में दो शिफ्टों के बीच कोई संपर्क नहीं.

इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार दीपांकर घोष कहते हैं कि सामाजिक दूरी और संसाधनों की सीमा को देखते हुए वह एक ही चक्कर में मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा का दौरा कर दिल्ली लौटे और इसमें उन्हें 36 घंटे का वक्त लगा. घोष ने इस तरह प्रवासियों की समस्या पर रपट लिखी. लेकिन फिर वो 40 दिन के लिए बिहार गए तो वहां उनके लिए सोशल डिस्टेंसिंग के सारे नियमों का पालन करना संभव नहीं था.

वह कहते हैं, “मैंने बिहार के भागलपुर को बेस बनाकर 40 दिन तक रिपोर्टिंग की. खुशकिस्मती से तब बिहार में कोरोना का ऐसा प्रकोप नहीं था जो अब दिख रहा है. ग्रामीण इलाकों में सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क लगाने जैसे नियमों का पालन करना मुश्किल था. वहां खबर निकालने के लिए आपको स्थानीय लोगों के जैसा दिखना और व्यवहार करना भी जरूरी था. अगर 10 लोगों ने मास्क नहीं लगाया है तो वहां खड़े आप मास्क लगाकर बिल्कुल एक इलीट आदमी लगेंगे जिससे बात करने में लोगों को झिझक होगी. तो मैंने कई बार मास्क लगाने के बजाय लोगों से दूरी बनाकर खड़ा होना अधिक ठीक समझा.” घोष को कोरोना पर रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित प्रेम भाटिया पुरस्कार दिया गया.

छंटनी का खौफ 

साफ है कि पत्रकारों के लिए संक्रमण का खतरा था लेकिन कई लोगों के लिए रोजगार जाने का खतरा उससे भी बड़ा था. कोरोना महामारी से कारोबार ठंडा पड़ा तो मीडिया संस्थानों की कमाई पर जबरदस्त चोट हुई. तकरीबन सभी टीवी चैनलों और अखबारों ने वेतन में कटौती की. कई संस्थानों ने स्टाफ की छंटनी भी की. जाहिर है कि नौकरी जाने का तनाव हर किसी के दिमाग में है.

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